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फानी= साँप, कैसे और कौन रखते हैं तूफानों के नाम?

खतरनाक फानी का आगमन

चक्रवाती तूफान ‘फानी’ ने अत्याधिक तीव्रता वाले तूफान का रूप ले लिया है. यह ओडिशा की तरफ 175 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से टकरा चुका है. मौसम विभाग का अनुमान है कि इससे भारी तबाही होने वाली है.सावधानी बरतते हुए तटीय इलाके खाली करवाए जा चुके हैं. तूफान के मद्देनज़र नौसेना, तटरक्षक बल और NDRF की टीमों को महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात किया गया है. सेना और वायु सेना की टुकड़ियों को भी तैयार रखा गया है.

‘तितली’ ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश में मचाई थी तबाही

इससे पहले अक्टूबर 2018 में आए चक्रवाती तूफान ‘तितली’ ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश में तबाही मचाई थी. भारी बारिश और भूस्खलन ने दोनों राज्यों के एक बड़े हिस्से में सामान्य जनजीवन को पटरी से उतार दिया था. ओडिशा के तटीय इलाकों से 3 लाख से भी ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था. इससे 1 महीने पहले भी ओडिशा को चक्रवाती तूफान ‘डे’ की मार का सामना करना पड़ा था. इससे पहले, 2013 में आए ‘फैलिन’ तूफान ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भारी तबाही मचाई थी.

यह जानना दिलचस्प है कि तबाही मचाने के लिए कुख्यात इन तूफानों का नाम कैसे रखा जाता है. 1953 से अमेरिका के मायामी स्थित नेशनल हरीकेन सेंटर और वर्ल्ड मेटीरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन की अगुवाई वाला एक पैनल तूफ़ानों और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नाम रखता रहा है.

गति के आधार पर होता है नामकरण

हर तूफान को नाम नहीं दिया जाता, इसका भी एक मानक है. 39 मील प्रति घंटा की गति से चलने वाली हवाओं के कारण उठने वाले चक्रवाती तूफान को नाम दिया जाता है. तूफान का प्रकार भी महासागर के नाम पर तय किया गया है. जैसे अटलांटिक सागर में उठने वाले तूफान को हरकेन , प्रशांत महासागर में उठने वाले को टायफून और भारतीय सागर में उठने वाले साइक्लोन कहते हैं. तूफान में हवा गति 74 मील प्रति घंटा होने पर इसे हरिकेन, टायफून और साइक्लोन में क्लासीफाइड किया जाता है.

पहले तूफानों का नामकरण महिलाओं के नाम पर किया जाता था

तूफानों का नाम रखने की शुरुआत वर्ल्ड मेट्रियोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन और मियामी नेशनल साइक्लोन सेंटर ने 1953 में की. पहले तूफानों का नामकरण महिलाओं के नाम पर किया गया. जिसकी शुरुआत A से Z के बढ़ते अक्षरों के क्रम में की गई. 1978 में पुरुषों से जुड़े नामों को शामिल किया गया.

2004 में WMO की अगुवाई वाला अंतरराष्ट्रीय पैनल भंग कर दिया गया. इसके बाद संबंधित देशों से अपने-अपने क्षेत्र में आने वाले चक्रवात का नाम खुद रखने को कहा गया. इसी साल हिंद महासागर क्षेत्र के आठ देशों ने भारत की पहल पर चक्रवातीय तूफानों को नाम देने की व्यवस्था शुरू की.

उत्तरी हिंद महासागर में तूफानों के कुल 64 नाम हो सकते हैं

साल 2000 में वर्ल्ड मेट्रियोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन ने भारतीय महासागर क्षेत्र से जुड़े देशों से तूफानों के नाम मांगे. इन देशों में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल है.

इन 8 देशों के मौसम वैज्ञानिकों ने 64 नामों की सूची बनाई. सभी देशों को एक-एक बार क्रमानुसार तूफान के नामकरण का मौका मिलता है. इस बार यह मौका बांग्लादेश को मिला था. बांग्लादेश ने खतरनाक तूफान का नाम फानी रखा. जिसका अर्थ साँप होता है.

भारत ने जो नाम दिए थे उनमें अग्नि, आकाश, बिजली, जल, लहर, मेघ, सागर और वायु हैं. वहीं पाकिस्तान ने नीलोफर, तितली और बुलबुल जैसे नाम दिए थे. अमरीका में हर साल 21 नामों की सूची तैयार की जाती है. इनमें ऑड-ईवन फॉर्मूला अपनाया जाता है. ऑड ईयर में महिला और ईवन-ईयर में पुरुषों के नाम पर तूफानों के नामकरण होते हैं.

पहले उत्तरी हिंद महासागर में उठने वाले चक्रवातों का कोई नाम नहीं रखा जाता था. इसकी वजह यह थी कि सांस्कृतिक विविधता वाले इस क्षेत्र में ऐसा करते हुए बेहद सावधानी की जरूरत थी, ताकि लोगों की भावनाएं आहत होने से कोई विवाद खड़ा न हो. लेकिन बाद में उत्तरी हिंद महासागर के भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, मालदीव, श्रीलंका, ओमान और थाईलैंड ने 64 नामों की सूची बनाई.

हर देश की तरफ से आठ नाम थे. अब चक्रवात विशेषज्ञों का पैनल हर साल मिलता है और जरूरत पड़ने पर यह सूची फिर से भरी जाती है. सदस्य देशों के लोग भी नाम सुझा सकते हैं. जैसे भारत सरकार इस शर्त पर लोगों की सलाह मांगती है कि नाम छोटे, समझ में आने लायक, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और भड़काऊ न हों. ‘फानी’ का नामकरण बांग्लादेश ने किया है. वैसे बांग्ला में इसका उच्चारण फोनी होता है और इसका मतलब है सांप.

तूफान के नाम से रहा है विवादों का रिश्ता

इतनी सावधानी के बावजूद भी तूफानों के नामकरण में विवाद हो जाते हैं. जैसे साल 2013 में ‘महासेन’ तूफान को लेकर आपत्ति जताई गई थी. श्रीलंका द्वारा रखे गए इस नाम पर इसी देश के कुछ वर्गों और अधिकारियों को ऐतराज था. उनके मुताबिक राजा महासेन श्रीलंका में शांति और समृद्धि लाए थे, इसलिए आपदा का नाम उनके नाम पर रखना गलत है. इसके बाद इस तूफान का नाम बदलकर ‘वियारु’ कर दिया गया.

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