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Skand Shukla

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लेखक देश के जाने-माने चिकित्साविज्ञानी हैं। लाखनऊ के संजय गांधी पीजीआई से जुड़े हैं
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फ़िलहाल तो लॉक डाउन अकेला इलाज है

Skand Shukla
कोविड-19 के दौर में लोगों की प्रश्नीय प्राथमिकताएँ लगातार बदल रही हैं। यह स्वाभाविक भी है। दो-तीन सप्ताह प्रश्न पहले विषाणु और उसके मारकत्व पर...
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यह टीका हमें बचा पाएगा कोरोना से!

Skand Shukla
“यह बचाएगा कोविड-19 से भारत को … और दुनिया को भी ! यह !” मदन भाई अपनी टीशर्ट का आधा बाज़ू ऊपर मोड़ते हुए उल्लास-भरे...
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कब और कैसे बनेगा कोविड का टीका!

Skand Shukla
अगर कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ टीका आ जाए , तो दुनिया में पर्याप्त रूप से उपलब्ध हो सकेगा ?” यह प्रश्न सुख्यात विज्ञान-जर्नल नेचर अपने सम्पादकीय...
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कैसी बात कर रहे हो लूक मॉन्तेग्निये मोशियो!

Skand Shukla
“महाजनो येन गतः स पन्थाः!” क्या यह सूक्ति अवैज्ञानिक बात कहते वैज्ञानिकों पर भी लागू होगी? महामारी के दौर में लूक मॉन्तेग्निये होने के क्या मायने हैं, जब वे यह कहते हैं कि सार्स-सीओवी 2 विषाणु को वूहान-प्रयोगशाला में एचआईवी के विरोध में टीका-निर्माण के दौरान बनाया गया? उनके अनुसार इस विषाणु के जीनोम (आनुवंशिक संरचना) में एचआईवी का भी कुछ अंश उपस्थित है। यद्यपि उनके इस कथ्य का दुनिया-भर के अनेक वैज्ञानिकों ने खण्डन किया है और कहा है कि ऐसी अवैज्ञानिक उद्घोषणाओं से उनकी वैज्ञानिक साख तेज़ी से नीचे गिर रही है। फ़्रांस के लूक मॉन्तेग्निये बड़े वैज्ञानिकों में आते हैं।  उन्होंने दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर एचआईवी-विषाणु की खोज की थी। यह एचआईवी-विषाणु मानव-शरीर में प्रवेश करके एड्स नामक रोग उत्पन्न करता है। इस बड़े काम के प्रति उन्हें विज्ञान के उच्चतम पुरस्कार से सन् 2008 में सम्मानित किया गया था। इस खोज के बावजूद मॉन्तेग्निये विज्ञान-जगत् में एक विवादास्पद व्यक्ति रहे हैं। अपने उन विचारों को जनता के सामने रखने के कारण, जिन्हें विज्ञान-सम्मत नहीं माना जा सकता। मसलन रोगकारक जीवाणुओं व विषाणुओं के डीएनए का तनु (डायल्यूट) विलयन बनाने पर कुछ ऐसे नैनो-संरचनाएँ अस्तित्व में आती हैं, जो विद्युत-चुम्बकीय तरंगें छोड़ा करती हैं। फिर इसी तरह वैज्ञानिकों की गोष्ठियों में वे होमियोपैथी को विज्ञान-सम्मत बताया करते हैं। अनेक रोगों में प्रयुक्त किये जाने वाले टीकों का सम्बन्ध वे ऑटिज़्म नामक विकास-सम्बन्धी रोग से बताया करते हैं, जो आज-कल अनेक बच्चों में देखने को मिल रहा है। ज़ाहिर है जो लोग होमियोपैथी में विश्वास रखते हैं या आधुनिक टीकाकरण को उद्योगपतियों की विज्ञानी साज़िश मानते हैं, वे मॉन्तेग्निये में अपना हीरो पाते हैं। उन्हें लगता है कि भ्रष्ट वैज्ञानिक-समाज में एक वे ही साहसी महानायक हैं, जो सत्य कहने का जोखिम उठा रहे हैं। ऐसे में तमाम देशों के होमियोपैथ अथवा वैक्सीन-विरोधी उन नाम का जनता के सामने उसे प्रभावित करने के लिए भरपूर इस्तेमाल करते हैं। समस्या किसी विचार को मानने में नहीं है। निजता निजता होती है, कोई आवश्यक नहीं कि वैज्ञानिक की हर निजता वैज्ञानिक ही हो। बल्कि सच तो यह है कि वैज्ञानिक हमेशा विज्ञान-सम्मत बात नहीं करता। कोई मनुष्य सम्पूर्ण रूप से अपना समूचा जीवन साइंटिफिक मेथड के अनुसार जीता ही नहीं। मनुष्यों में वैज्ञानिकता न्यूनाधिक हो सकती है, किन्तु उनमें अपनी मनोधारणाएँ, अन्धविश्वास व रूढ़ियाँ भी वास किया करती हैं। किन्तु विज्ञान अपनी बातों में इतना स्पष्ट और साफ़ होता है कि बड़े-से-बड़े भ्रमजीवी के मन में भी तरेड़ तो डाल ही देता है। कोई आश्चर्य नहीं कि बड़े-बड़े धर्मगुरुओं को आज-कल हम ‘विज्ञान भी तो अब मान चुका है’ या ‘ विज्ञान भी यही कहता है’ के वाक्य अपने प्रवचनों व गोष्ठियों में इस्तेमाल करते देखते हैं। लोग वैज्ञानिक के श्रीमुख से सुनी हर बात को विज्ञान-सम्मत मान लेते हैं। ‘विज्ञान भी तो अब मान चुका है’ या ‘विज्ञान भी तो यही कहता है’ से लोगों का आशय होता है कि अमुक वैज्ञानिक ने अमुक जगह पर अमुक बात कही है, जो हम भी कहते रहे हैं। अब चूँकि अमुक व्यक्ति बड़े वैज्ञानिक हैं और उनकी साख आप-जैसे आधुनिक ‘पढ़े-लिखे’ लोगों में बहुत है, इसलिए आपके सामने उनका सत्यापन रख रहा हूँ। ये वैज्ञानिक भी तो यही मान रहे हैं! ये वैज्ञानिक भी तो यही कहते हैं! कोई वैज्ञानिक जो-कुछ कहे , वह हमेशा विज्ञानसम्मत नहीं। कोई वैज्ञानिक जो-कुछ माने, वह हमेशा विज्ञान-सम्मत नहीं। लेकिन जिस तरह प्रेम-कविता लिखने वाले साहित्यकार से पाठक सदा-सर्वदा ‘प्रेममय’ बने रहने की आशा लगाये रहते हैं, उसी तरह विज्ञान रचने वाले वैज्ञानिक से यह उम्मीद लगायी जाती है कि वह हमेशा ‘विज्ञानमय’ रहेगा। विज्ञान ही जियेगा, विज्ञान ही कहेगा। विज्ञान व छद्मविज्ञान में अन्तर है। जब आप छद्म विज्ञान के किसी विचार को मानते हैं, तब आप उसे सिद्ध करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देते हैं। आप उसके पक्ष में प्रमाण जमा करते हैं। आपकी पूरी कोशिश होती है कि छद्म विज्ञान पर से आप छद्मता का आवरण छुड़ा दें। ऐसे प्रमाण को आपको मिल भी जाते हैं। जानते हैं क्यों? क्योंकि आपके मन में अपने छद्म-विज्ञान-विचार के प्रति अनुराग है, ममता है। आप उसे छोड़ नहीं पा रहे, आप उसके पक्ष में दलील-पे-दलील दिये जा रहे हैं। विज्ञान उलटे ढंग से काम करता है। वह निर्मम ढंग से कहता है कि जिसे मान रहे हो, उसके विरोध में साक्ष्य जमा करो। पक्ष में नहीं, विरोध में। अपने विचार को ग़लत सिद्ध करने में लगो, ग़लत नहीं सिद्ध कर पाओगे तो सही तो वह अपने-आप हो ही जाएगा। इस कॉन्सेप्ट का नाम फाल्सिफ़ायबिलिटी है। विज्ञान फाल्सिफायबिल है, छद्म विज्ञान फाल्सिफायबिल नहीं है। विज्ञान की यह निर्ममता बायस यानी भेदभाव से बचने के लिए है। ऐसा कोई व्यक्ति है ही नहीं जो एकदम तटस्थ होकर रिसर्च करे। वैज्ञानिक भी नहीं। अगर एकदम तटस्थ होता, तब उसी विषय क्यों को चुनता ? चुनने में भी रुचि आ गयी ! जो रुचिकर विषय था, उसी पर शोध चुना गया। जब चुनाव रुचि के अनुसार किया गया, तब उसके शोध के दौरान निकलने वाले निष्कर्षों में ममता और अनुराग के कारण वैज्ञानिक भ्रमित क्यों नहीं हो सकता?  ऐसा न हो, इसलिए वैज्ञानिक कार्यप्रणाली के दौरान पक्ष नहीं, विपक्ष में साक्ष्य जुटाने को कहा जाता है। अपनी बात झुठलाने का प्रयास करो, झुठला न पाए, तब सच तो हो ही जाएगी! छद्म विज्ञान या आस्था के मामलों में झुठलाना नहीं चलता। वहाँ अपने विचार या मान्यता को सच साबित करने की कोशिशें चलती हैं। विचार या मान्यता के प्रति व्यक्ति पहले से चिपका हुआ है : वह तो जो कुछ भी कहेगा , पक्ष की बातें ही कहेगा। विरोधी बातों पर वह ध्यान देगा ही नहीं। सांख्यिकी के अनुसार पक्ष-विपक्ष का अन्वेषण करेगा ही नहीं। जो विचार पहले से तय करके प्रमाण ढूँढने निकले , वह छद्मविज्ञानी है। जो विचार के विरोध में गणितीय ढंग से प्रमाण खोजने की कोशिश कर रहा हो , वह विज्ञान-सम्मत है। लूक मॉन्तेग्निये ने विज्ञान को बड़ी उपलब्धियों से समृद्ध किया है। पर वे वैज्ञानिक कार्यप्रणाली से बड़े नहीं हैं। वैज्ञानिक कार्यप्रणाली से बड़ा कोई वैज्ञानिक नहीं होता। लेकिन उत्तर-सत्य के दौर में भ्रमित ढंग से जी रही जनता मुख्यधारा के विज्ञान से जब कट जाती है , तब वह लूक मॉन्तेग्निये-जैसों की सुनती है। जनता में ज़्यादातर को वैज्ञानिक कार्यप्रणाली पता ही नहीं , उन्हें लगता ही नहीं कि वैज्ञानिक भी अन्धविश्वासी हो सकते हैं। एक मित्र कहने लगे कि मॉन्तेग्निये ही आपको क्यों ग़लत लगते हैं। हो सकता है कि अन्य वैज्ञानिक ग़लत हों। बिक गये हों। उद्योगपतियों के इशारों पर नाच रहे हों। दुनिया में राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति में भ्रष्टाचार इतना अधिक है। हर जगह आपको करप्शन-ही-करप्शन मिलेगा। ऐसी में हो सकता है जिसे आप दोषी समझ रहे हों , वह निर्दोष हो और जिसे निर्दोष समझ बैठे हों , वह पूरा-का-पूरा वैज्ञानिक समाज ही दोषयुक्त ! मित्र एक बात नहीं समझ रहे। राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति में काम करने का तरीक़ा विज्ञान की तरह एकदम दिशा-निर्दिष्ट व साफ़-सुथरा नहीं होता। दो-सौ सालों से साइंटिफिक मेथड यथावत् है। ( कुछ सुधार किये गये हैं , पर उन पर बात बाद में। ) राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति में जो पॉलिसी-सम्बन्धी दोष आएगा , हो सकता है कि वह जल्दी पकड़ न आये। राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति में क्षेत्रीयता के मायने अधिक हैं। वहाँ भ्रष्टाचार को लम्बी देर तक छिपाया जा सकता है। पर विज्ञान का स्वभाव ही अन्तरराष्ट्रीय है और वहाँ पीयर-रिव्यूअल प्राथमिक शर्त। दूसरे वैज्ञानिक आपके काम का मूल्यांकन करेंगे , उसे दोहराएँगे। आप दूसरों के काम के साथ यही करेंगे। राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति में इस तरह का रिव्यूअल सम्भव ही नहीं , क्योंकि समाज प्रयोगशाला है ही नहीं। समाज में हुई किसी एक क्रान्ति को आप बीकर में दो घोलों के मेल की तरह तापमान व दबाव को यथावत् रखकर बार-बार नियन्त्रित ढंग से कैसे करेंगे ? मित्र मेरे सामने कार्ल मार्क्स का अर्थशास्त्र और सिग्मंड फ़्रायड का मनोविज्ञान रखते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि ये दोनों छद्म विज्ञान की ही श्रेणी में आते हैं। भौतिक घटना को देखना / पहचानना – प्रश्न करना व इससे सम्बन्धित पूर्वशोध एकत्रित करना -परिकल्पना प्रस्तुत करना-प्रयोग करना -आँकड़ों का उचित अन्वेषण करना – निष्कर्ष निकालना — वैज्ञानिक कार्यप्रणाली के स्थूल मुख्य चरण हैं। जिस भी विचार या सिद्धान्त को हम इस कसौटी पर नहीं कस सकते , उसे हम वैज्ञानिक नहीं मान सकते। मार्क्स व फ़्रायड के सिद्धान्त फाल्सिफायबिल नहीं हैं , इसलिए वे वैज्ञानिक भी नहीं हैं। जो इन सिद्धान्तों में विश्वास रखते हैं , वे उन्हें झुठलाने के लिए प्रयास नहीं करते बल्कि उन्हें सत्य सिद्ध करने के लिए प्रमाण ढूँढ़ते हैं। अपने विचार के प्रति यदि पहले से ममता रही और उसके कारण भेदभाव (बायस ) आ गया , तब वह विज्ञान की निर्मम कसौटी पर कसा कैसे जाएगा ? कहने की ज़रूरत नहीं कि लूक मॉन्तेग्निये छद्म विज्ञानियों के महानायक हैं। किन्तु वैज्ञानिक समाज में उनकी साख तेज़ी से लुढक रही है। जो लोग वैज्ञानिक कार्यप्रणाली , फाल्सिफायबिलिटी और पीयर-रिव्यूअल जैसे कॉन्सेप्टों से अपरिचित हैं , वे उनमें विज्ञान का क्रान्तिकारी पा रहे हैं। वह जो सच कहने का साहस रखता है , वह जो विज्ञान को उद्योगपतियों व सरकारों के भ्रष्ट चंगुल से छुड़ाना चाहता है। किन्तु अपने अविज्ञानी विचारों के प्रति ममत्व रखने वाले लोगों को स्वयं शोध में शामिल होने का प्रयास करना चाहिए। शोध को समझने , उसमें शामिल होने और उसे नतीजों के मनमाफ़िक न आने पर विचार को त्याग देने की सीख तभी उन्हें मिल सकती है। लिनस पाउलिंग से लूक मॉन्तेग्निये तक छद्म विज्ञानपोषी विचारधारा बहती रही है। मानने वाले मानते रहे हैं , मानते रहेंगे।...
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अन्तःस्थ और अर्जित , प्रतिरक्षा-तन्त्र के दोनों हिस्से मिलकर के शत्रु-कीटाणुओं से लड़ते हैं। किसी संक्रमण में अन्तःस्थ प्रतिरक्षा अधिक काम आती है , किसी...
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कब तक लड़ेगा आदमी कोरोना से!

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वर्तमान कोविड-19 पैडेमिक की अन्तिम नियति किस तरह होगी ? तीन रास्ते हैं : पहला असम्भव जान पड़ता हुआ , दूसरा जोखिम-भरा और तीसरा बहुत...
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वर्तमान कोरोना-विषाणु फेफड़ों में पहुँच कर गम्भीर समस्या कैसे उत्पन्न करता है, इसे समझने के लिए पहले यह समझिए कि फेफड़ों की सामान्य कार्य-विधि क्या...
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ध्यान रखें सब्ज़ियाँ साबुन या डिटाल से नहीं धोनी हैं

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जब दिनेश ने मुझे बताया कि इस समय कोविड 19-पैंडेमिक के दौरान वह अपने घर में आने वाली सब्ज़ियों-फलों को डेटॉल और सोडियम हायपोक्लोराइट से...
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