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शंभूनाथ शुक्ल

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लगता है, कलम लेकर ही पैदा हुए थे। जब मन आया, जहाँ मन आया और जो मन आया, वही लिख दिया। बाद में लेखन को ही जीविका बना लिया। पिछले 40 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में। सामाजिक राजनैतिक मुद्दों से लेकर यात्रा-संस्मरण आदि सब विषयों पर लिखा। दैनिक जागरण से कैरियर की शुरुआत कर जनसत्ता में चंडीगढ़ और कोलकाता के संपादक रहे। करीब 11 वर्षों तक अमर उजाला के अलग-अलग संस्करणों में संपादक रहे। फिलहाल स्वतंत्र लेखन। इस कॉलम में उनके कलम के अलग अंदाज़।
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भूमिजा भूमि में समा गईं!

शनिवार, दो मई को रात 11 बजे दूरदर्शन पर 25 मार्च से निरंतर चल रहा ‘रामायण’ सीरियल समाप्त हो गया, जबकि लॉक-डाउन दो हफ़्ते के...
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अब काहे का मई-दिवस!

मुझे कानपुर का होने पर गर्व है! कनपुरिया कहे जाने पर भी! कुछ लोग हमें मघैया कह देते हैं, उस पर भी मुझे फ़ख़्र है।...
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चाँद के पार जो सितारा है!

शंभूनाथ शुक्ल
जब ऋषि कपूर की फ़िल्म बॉबी आई थी, मैं तब बी.एस-सी. में पढ़ता था, उम्र 18 साल के आस-पास थी। कानपुर की न्यू बसंत टाकीज़...
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टका सेर भाजी, टका सेर खाजा!

शंभूनाथ शुक्ल
एक बार बोधिसत्त्व ऐसे देश में पहुंचे जहां का राजा सनकी था। वह बार-बार अपने सलाहकार बदला करता। पर चीजें वहां बहुत सस्ती थीं। टका सेर भाजी टका सेर खाजा। यानी आलू खाओ चाहे पनीर सब एक ही भाव। बोधिसत्त्व का चेला मगन। बोला गुरू जी यहीं रहें। अब कहीं नहीं जाओगे। पर बोधिसत्त्व ने कहा कि नहीं यहां नहीं रहना कहीं और चलते हैं। और वे निकल पड़े। तब रास्ते में उनके प्रिय शिष्य आनंद ने पूछा कि भंते आप वहां रुके क्यों नहीं, वहीं पर विहार क्यों नहीं किया? तब बोधिसत्त्व ने कहा कि वत्स आनंद, ऐसे देश में नहीं रहना चाहिए जहां के राजा को सही-गलत का ज्ञान नहीं हो और वह सलाहकारों के सिखाये पर चलता हो।बोधिसत्त्व ने एक किस्सा सुनाया। एक देश में गजमुखी प्रसाद सिंह नाम का एक राजा राज्य करता था। उसका मंत्री शूलपाणि सिंह उसका भरोसेमंद और सलाहकार था। एक दिन शिकार पर जाते समय महाराज गजमुखी प्रसाद सिंह ने शूलपाणि से पूछा कि मंत्रीवर आज मौसम कैसा रहेगा क्योंकि मैं शिकार पर निकल रहा हूं। आसमान साफ था और दूर-दूर तक न तो बादल और न ही बारिश के कोई चिन्ह। इसलिए मंत्री ने कहा कि महाराज मौसम साफ रहने की उम्मीद है। राजा गजमुखी प्रसाद सिंह शिकार पर निकल पड़े। अभी जमना पार ही की थी कि शाहदरे के पास एक धोबी को अपने कपड़े समेटते देखा। उन्होंने उससे बुलाकर कहा कि अरे तू कैसा धोबी है ऐसे धूपवाले साफ मौसम में कपड़े समेटने लगा। धोबी बोला महाराज बारिश आने वाली है। पर बारिश के कोई संकेत नहीं थे इसलिए महाराज आगे बढ़ गए। अभी वे मोहन नगर पहुंचे ही थे कि अचानक बारिश शुरू हो गई और जोर-जोर से बूंदें पडऩे लगीं। महाराज अपने महल को वापस आ गए और मंत्री शूलपाणि को बुलाकर कहा कि अरे मंत्री तू तो निरा मूर्ख ही है। तू तो कह रहा था कि आसमान साफ रहेगा और बारिश पड़ गई जाओ मैं तुझे फायर करता हूं और तत्काल महाराज ने शूलपाणि की लालबत्ती छीन ली। महराज ने अपने करीबी दुर्जन नाई को बुलाया और कहा कि तू जाकर शाहदरा वाले उस धोबी को बुला लाओ जिसका नाम बाबूराम है। दुर्जन नाई उसे बुला लाया और महाराज के सामने पेश किया। महाराज ने कहा कि धोबी तू बड़ा अक्लमंद है। मैं आज से तुझे लालबत्ती और लुटियन्स जोन में बंगला देता हूं और अब तेरा नाम बाबू राम नहीं श्वेतश्व होगा। धोबी तो अति प्रसन्न हुआ। और बोला महाराज की जय होवे पर महाराज यह जानकारी मुझे अपने गधे से मिली। महाराज ने पूछा कैसे तो वह बोला कि जब-जब गधा आसमान की तरफ मुंंह उठाकर रेंकने लगता है तब-तब मैं समझ जाता हूं कि बारिश आने वाली है। महाराज गजमुखी प्रसाद सिंह ने यह सुनते ही उस धोबी को वहां से भगा दिया और भगंदरू नामक उस गधे को बुलवाकर उसे अपना मंत्री नियुक्त किया। उस गधे मंत्री का नाम पड़ा श्वेताश्वतर। आनंद यह सुनते ही बोधिसत्त्व का चरणावत हो गया और उसकी जिज्ञासा का शमन हुआ।...
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बेढंगी और बदरंग होती ज़िन्दगी!

शंभूनाथ शुक्ल
मेरी पत्नी कहती हैं, कि ज़िंदगी कितनी बेढंगी और बदरंग होती जा रही है। पहले महिलाओं की बैठकें (किटी पार्टियाँ) होती थी, तब औरतें ख़ूब सुख-दुख बतियातीं। ख़ूब पकवान खातीं और अंत्याक्षरी होती या गाने गाये जाते। पर अब इन बैठकों में भी चार औरतें अपने-अपने मोबाइल में फेसबुक अथवा व्हाट्स एप खोल लेती हैं। बाक़ी में से कुछ फोन पर बतियाती हैं और बाक़ी इधर-उधर की बातें करने लगती हैं। कहाँ गया, वह गाना-बजाना! मेरी पत्नी को गाने-बजाने का शौक़ है, और इसी वज़ह से उनका उच्चारण साफ़ और उर्दू लफ़्ज़ों पर उनकी पकड़ है। वे ‘ज’ और ‘ज़’ तथा ‘ख’ एवं ‘ख़’ का सही उच्चारण कर लेती हैं।  बचपन में हर साल 22 मई को हम अपने गाँव चले जाते, जो कि कानपुर शहर से कुल 20 मील दूर है, और 8 जुलाई को लौट आते। 1967 में मैंने आठवां पास किया था, उम्र रही होगी 12 साल की। लौटने की एक रात पूर्व यानी सात जुलाई की रात मैंने अपने गाँव की महफ़िल में यह गाना सुनाया, तो लोग दंग रह गए-  ये रात जैसे दुल्हन बन गई है चिरागों सेकरुंगा उजाला मैं दिल के दाग़ों सेआज की रात मेरे, दिल की सलामी ले लेकल तेरी बज़्म से दीवाना चला जाएगाशम्मा रहे जाएगी परवाना चला जाएगा!तेरी महफ़िल तेरे जलवे हों मुबारक तुझकोतेरी उल्फ़त से नहीं आज भी इनकार मुझेतेरा मय-खाना सलामत रहे ऐ जान-ए-वफ़ामुस्कुराकर तू ज़रा देख ले इक बार मुझेफिर तेरे प्यार का मस्ताना चला जाएगा!मैने चाहा कि बता दूँ मैं हक़ीक़त अपनीतूने लेकिन न मेरा राज़-ए-मुहब्बत समझामेरी उलझन मेरे हालात यहाँ तक पहुंचेतेरी आँखों ने मेरे प्यार को नफ़रत समझाअब तेरी राह से बेगाना चला जाएगा!तू मेरा साथ न दे राह-ए-मुहब्बत में सनमचलते-चलते मैं किसी राह पे मुड़ जाऊंगाकहकशां चांद सितारे तेरे चूमेंगे क़दमतेरे रस्ते की मैं एक धूल हूँ उड़ जाऊंगासाथ मेरे मेरा अफ़साना चला जाएगा! 1967 में आई फिल्म ‘राम और श्याम’ का यह गाना बड़ा लोकप्रिय हुआ था। दरअसल इन फ़िल्मी गानों में भावों को व्यक्त करने के लिए स्वर के साथ-साथ चेहरे का उतार चढ़ाव उसकी एक्सरसाइज़ भी करता था, जो झुर्रियों से बचाता था। पुरानी फिल्मों का हर गाना पीड़ा, विरह, राग और विराग को दर्शाता था, गाना सुनने वाला और सुनाने वाला दोनों ही उसमें डूब जाया करते थे। 1961 में आई थी, फिल्म “हम-दोनों”। देवानंद और साधना की इस फिल्म की स्टोरी तो लाज़वाब थी ही, इसका गाना-  अभी ना जाओ छोड़कर कर दिल अभी भरा नहींअभी अभी तो आई हो, बहार बन के छाई होहवा ज़रा महक तो ले, नजर ज़रा बहक तो लेये शाम ढल तो ले ज़रा, ये दिल संभल तो ले ज़रामैं थोड़ी देर जी तो लूँ, नशे के घूँट पी तो लूँअभी तो कुछ कहा नहीं, अभी तो कुछ सुना नहींअभी ना जाओ छोड़कर कर दिल अभी भरा नहींसितारे झिलमिला उठे, चराग जगमगा उठेबस अब ना मुझ को टोकना, न बढ़ के राह रोकनाअगर मैं रुक गयी अभी, तो जा न पाऊँगी कभीयही कहोगे तुम सदा के दिल अभी नहीं भराजो ख़त्म हो किसी जगह, ये ऐसा सिलसिला नहींअभी ना जाओ छोड़कर कर दिल अभी भरा नहींअधूरी आस छोड़ के, अधूरी प्यास छोड़ केजो रोज़ यूँ ही जाओगी, तो किस तरह निभाओगीके ज़िन्दगी की राह में, जवाँ दिलों की चाह मेंकई मकाम आयेंगे, जो हम को आजमाएंगेबुरा ना मानो बात का, ये प्यार है गिला नहींयही कहोगे तुम सदा के दिल अभी भरा नहीं! हम-दोनों क्लासिक फिल्म थी। इसके बाद 1964 में आई, गंगा-जमना! दिलीप कुमार और वैजयंती माला की गज़ब फिल्म थी यह। संभवतः अवधी भाषा की पहली और आखिरी फिल्म। मज़े की बात, कि इस फिल्म में कन्हैया लाल के सिवाय सारे कलाकार पंजाबी हैं। दिलीप कुमार ने इस फिल्म की पटकथा लिखी और निर्माता भी वही थे। और वे ही नायक हैं। पंजाबी मुस्लिम परिवार से आए दिलीप के उच्चारण में कहीं कोई दोष नहीं। वे एक ठाकुर किसान बनते हैं। किसान का सीधापन, सरलता, धार्मिकता और निश्छलता अद्भुत है। फिल्म की नायिका वैजयंती माला तमिल हैं। यह सुपरहिट फिल्म थी। इसके गाने प्रेरक हैं। इसका एक गाना तो आज भी प्रेरणा देता है- इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के।ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के।।दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहनासच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना।रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के।इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के।अपने हों या पराए सबके लिये हो न्यायेदेखो कदम तुम्हारा हरगिज़ न डगमगाएरस्ते बड़े कठिन हैं चलना सम्भल-सम्भल केइन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के।इन्सानियत के सर पर इज़्ज़त का ताज रखनातन मन की भेंट देकर भारत की लाज रखनाजीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के,इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के। (अब न वे गाने रहे, न गाना गाने की इच्छा-शक्ति!)...
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