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भारत में डचों ने पुर्तगालियों को दी शिकस्त, पर अंग्रेजों से मिली हार

वास्कोडिगामा के भारत आने के बाद यहाँ पर यूरोपियनों का आना शुरू हो गया. उन्होंने यहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापारिक दृष्टि से कदम रखा. जिसमें सबसे पहले 1500 ई० के आसपास पुर्तगालियों का आगमन हुआ. उसके बाद डच, फ़्रांसीसी, ब्रिटिश जैसी यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों ने यहाँ अपनी शाख जमायी . भारतीय इतिहास के उन्हीं पन्नों में एक दौर ऐसा आया जब पुर्तगालियों को डचों के सामने करारी हार का सामना करना पड़ा, मगर वो ब्रिटिशों के सामने न टिक सके. फिर डचों को पराजय मिली. 

इतिहास में घटित हुई इसी दास्तां के बारे में जानना हमारे लिए दिलचस्प होगा. आखिर कैसे भारत में डचों ने संघर्ष कर यहाँ पर व्यापार को एक नई दिशा दी और अपना पैर जमाया?… फिर कैसे यहाँ उनका पतन हो गया?

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पुर्तगालियों को दी करारी शिकस्त 

भारत में पुर्तगालियों के आने के लगभग 100 साल बाद अंग्रेजों के साथ-साथ डचों का आगमन हुआ. बहरहाल 1580 ई० स्पेन के पतन के साथ पुर्तगालियों का साम्राज्य बिखर चुका था. दोनों को करारी हार मिली थी. यह वही दौर था जब डच अपनी शक्ति को बढ़ाने का लगातार प्रयास कर रहे थे.

डचों ने नीदरलैंड से स्पेनवासियों को भगाने में बहुत संघर्ष किये. उन्होंने पुर्तगालियों से मसाले का व्यापार छीनने का संकल्प लिया. डचों की व्यापारिक कंपनी की खासियत यह थी यह पूर्णत: व्यापारिक संस्था थी. 1596 ई० में पहली बार कर्नेलिस डी हाउटमेन नामक डच नागरिक भारत पहुंचा. इसने डचों को भारत में व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित किया. 

1602 ई० में डच संसद द्वारा पारित डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई. सन 1605 ई० में पहली बार भारत के मसुलीपट्टम में डचों ने अपनी फैक्ट्रियां स्थापित की. इसके बाद उन्होंने भारत और हिन्द महासागरीय क्षेत्रों में पुर्तगाली साम्राज्य को चुनौती देते हुए एक के बाद एक फैक्ट्रियां खोलीं. इनमें 1610 ई० में पुलीकट, 1616 ई० में सूरत, करकिल, कासिम बाजार पटना, बालासोर व कोचीन आदि स्थानों की डच फ़ैक्टरियां शामिल हैं.

डचों ने अम्बोयना, 1619 ई० में मसाला द्वीप, 1632 ई० में मुगलों के समर्थन से हुगली क्षेत्र से पुर्तगालियों  को हटाना शुरू कर दिया. वे 1641 ई० में मलक्का और 1658 ई० में श्रीलंका में पुर्तगालियों पर विजय प्राप्त किए. एशिया में अपनी व्यापारिक शक्ति को बढ़ाने के लिए डचों ने पुर्तगालियों के जहाज़ों व उनके मुख्य अड्डों पर कई हमले किए, जिसमें पुर्तगालियों को काफी नुकसान हुआ था. 

पुर्तगालियों के उनके आतंरिक मामले व निरंकुश शासक उनके पतन का मुख्य कारण बना. पुर्तगाली व्यापारियों पर इनके राजा का अत्यधिक नियंत्रण था. इसके अलावा इनकी धर्म नीति भी इनको ले डूबी. कहा जाता है कि उन्होंने लोगों को जबरन धर्म परिवर्तन कराया. यहाँ तक उन्होंने भारतीय शासकों व जनता के प्रति भी धार्मिक असहिष्णुता दिखाई.

उन्होंने डकैती व लूटमार को भी अपनी नीति का हिस्सा बनाया. इन सभी कारणों ने पुर्तगालियों का अस्तित्व भारत समेत बाकी क्षेत्रों में समाप्त हो गया. शुरूआत में डचों ने काली मिर्च व अन्य मसालों के प्रति ज्यादा रूचि दिखाई. इंडोनेशिया में तो डच ने मसाले का अपना मुख्य केंद्र बना लिया. 

भारत में डचों को अपना व्यापारिक धाक ज़माने के लिए स्थानीय शासकों का भी बहुत साथ मिला. गोलकुंडा के सुल्तान के अलावा जिंजी, मदुरै व तंजावुर के शासकों ने इनको व्यापारिक सुविधाओं के साथ- साथ शुल्क में काफी छूट दी. कोचीन के शासक ने तो मध्य क्षेत्र में काली मिर्च के व्यापार का एकाधिकार दे दिया. इसके साथ ही डचों को उत्तर- दक्षिण में चुंगी में रियायत मिली. कपड़ा व्यापार में उन्हें मुहर शुल्क में छूट दे दी गई. जिससे इन्हें कोरोमंडल तट से भारतीय वस्त्रों के व्यापार में भारी मुनाफा मिला. वे भारत से नील का भी बिजनेस करते थे.  

उन्होंने चीन में भारतीय अफीम, रेशम, व सूती वस्त्रों आदि को बेचकर काफी फायदा कमाया. डच दलालों या सीधा बुनकरों से संपर्क करते और उन्हें काफी सहूलियतें व रोजगार के अवसर प्रदान करते. एक बार जब गोलकुंडा का एक बुनकर लगान नहीं चुका पाया तब डचों ने उसका लगान चुकाकर उसकी मदद की थी. 

ब्रिटिशों से मिली पराजय

डचों ने 17वीं शताब्दी के शुरुआत में भारत (India) समेत एशिया पर अपना धाक जमाना शुरू किया. उन्होंने 17वीं शताब्दी के मध्य तक पुर्तगालियों को शिकस्त देते हुए मसालों, कपड़ों व अफीम आदि व्यापारों में अपना वर्चस्व कायम कर लिया था, लेकिन अंग्रेजों के रूप में अभी उनका एक प्रतिद्वंद्वी बाकी था.

डच यमुना घाटी और मध्य भारत में नील का उत्पादन व चावल आदि का व्यापार जोर शोर से कर रहे थे. फिर 17वीं शताब्दी के मध्य भारत व हिंद महासागर में प्रभुत्व स्थापित करने के लिए डच व अंग्रेजों के बीच संघर्ष का दौर शुरू हो गया. इन दोनों के बीच यूरोप में तीन आंग्ल-डच युद्ध हुए, जिनमें ब्रिटिशों को ही जीत मिली. इससे डचों को काफी नुकसान पहुंचा था.

बहरहाल, 1717 ई० में मुग़ल साम्राज्य के द्वारा अंग्रेजों को व्यापारिक फरमान मिलने के बाद डच शक्ति कमज़ोर होने लगी. अंग्रेजों ने उन्हें भारत में स्थापित नहीं होने दिया. जिस शक्ति व नीति के द्वारा डचों ने पुर्तगालियों को परास्त किया था वो नीतियाँ अंग्रेजों के विरुद्ध काम न आ सकी. 

आरंभ में दोनों के अच्छे सम्बन्ध थे, परन्तु पुर्तगालियों के बाद दोनों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा की बात थी. आगे वे दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन गए. आरंभिक मुकाबले में डचों ने कुछ हद तक कड़ी टक्कर भी दी, लेकिन बाद में ब्रिटिशों ने उन्हें कमज़ोर कर दिया था. 1759 में बेदारा युद्ध में अंग्रेजों से मिली हार के बाद भारत में उनकी सारी ताक़तें चकनाचूर हो गईं. 

दरअसल, डच कर्मचारियों में ब्रिटिश कंपनी के कर्मचारियों के समान नेतृत्व व उत्साह की भावना की कमी थी. इनका वेतन भी अपेक्षाकृत बहुत कम था, इसीलिए वे निजी व्यापारों में ज्यादा सक्रियता दिखाते. अधिकारियों की उपेक्षापूर्ण नीतियों की वजह से डच कंपनी का प्रदर्शन लगातार ख़राब होता गया. 

ब्रिटेन के मुकाबले डच कंपनियों के पास संसाधनों का भी अभाव था. इसके अलावा यूरोप में अन्य यूरोपियन व्यापारिक शक्तियों से डचों ने  लगातार युद्ध करके अपना बहुत कुछ गवांया था. इन सभी कारणों से वे बाद में भारत में अपना साम्राज्य कायम रखने में असफल रहे. इस तरह पुर्तगाली शक्तियों के सामने मज़बूती के साथ खड़े रहने वाले डच शक्ति अपनी कुछ कमियों की बदौलत ब्रिटिशों के सामने धराशाही हो गए.

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