Local Heading

पुलवामा की बरसी पर एक सवाल

पुलवामा हमले को आज एक साल पूरा हो गया, आज से ठीक एक साल पहले कश्मीर के पुलवामा में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल  के 44 जवान एक आत्मघाती हमले में उस समय मारे गए थे, जब उन्हें ले जा रही बस को कार से टक्कर मार दी गयी थी। कार में भारी मात्रा में विस्फोटक था। देश को हिला कर रख देने वाले पुलवामा हमले की जांच का चालान एक साल गुजर जाने के बाद भी पेश नहीं हो सका है। हमले की रूपरेखा तो पता चल चुकी है, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर किस शख्स का क्या रोल था, यह अब तक समझ में नहीं आ रहा। मामले की जांच कर रही एनआईए ने इस हमले में कई लोगों की पहचान की है। एनआईए इस हमले के पाकिस्तान कनेक्शन की तलाश ही कर रही है। लेकिन स्पष्ट रूप से अभी तक कोई बात नही की गई है। इस हमले में सुरक्षा के मोर्चे पर हुई चूक की सबसे बड़ी भूमिका रही है लेकिन मोदी सरकार इस बारे में हमेशा बात करने से बचती आई है। दरअसल खुफियां एजेंसियों को इस तरह के हमले का अंदेशा था। मकबूल बट की बरसी को लेकर आतंकियों के बड़ी वारदात की आशंका जताई जा रही थी। आठ फरवरी को इस सिलसिले में एक अलर्ट भी जारी किया गया था। इसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी आईईडी के जरिये सुरक्षा बलों के काफिले हमला कर सकते हैं और इसलिए सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए। लेकिन कोई इंतजाम नही किया गया।

हाईवे बंद रहने के कारण जम्मू स्थित ट्रांजिट कैंप में जवानों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। ऐसे अलर्ट के मामले में आमतौर पर जवानों को एहतियात बरतते हुए विमान से भेज दिया जाता है। बताया जाता है कि 4 फरवरी से बर्फबारी के कारण जम्मू में फंसे सीआरपीएफ के जवानों को भी हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुंचने की मंजूरी मांगी गई थी। सीआरपीएफ के अधिकारियों ने इसका प्रस्ताव बनाकर मुख्यालय भेजा था। अधिकारी एक हफ्ते तक विशेष विमान की मांग करते रहे लेकिन सरकार ने सीआरपीएफ अधिकारियों के विमान मुहैया करवाने के निवेदन को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद ही 2500 जवानों को 78 बसों में सड़क मार्ग से ही भेजने का निर्णय लिया गया। यह काफिला 14 फरवरी को सुबह साढ़े तीन बजे जम्मू से श्रीनगर के लिए रवाना हो गया। दोपहर बाद 3:15 बजे आतंकी हमला हो गया। एक महत्वपूर्ण बात और है जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के आवागमन के लिए एक तय प्रक्रिया बनी हुई है। उनका काफिला गुजरने से पहले संबंधित इलाके की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार रोड ओपनिंग पार्टी यानी आरओपी इसके लिए हरी झंडी देती है। आरओपी में सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान शामिल होते हैं। जानकारों के मुताबिक गुरुवार को तड़के साढ़े तीन बजे जम्मू से निकलने से पहले आरओपी ने रास्ते के सुरक्षित होने की हरी झंडी दे दी थी। सवाल है कि इसके बावजूद 60 किलो विस्फोटक से लदी कार लेकर हमलावर हाईवे पर कैसे पहुंच गया। यह भी कि उसे इतना विस्फोटक कहां से मिला? इस बात का भी अभी तक कोई जवाब नही दिया गया है।

ये भी पढ़ें:प्रयागराज: झूठ बोलकर छूटी लेना पड़ा वकील को महंगा

जो सीआरपीएफ़ के जवान इस हमले में मारे गए उनको आज तक आधिकारिक रूप से शहीद का दर्जा नही दिया गया है। एक्शन में मारे जाने वाले अर्धसैनिक बलों के जवान शहीद की श्रेणी में नहीं आते। लेकिन शहीद-शहीद कह के उनके नाम पर वोट खूब मांगे जाते हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती हैं कि किस प्रकार केंद्र की सरकार ने पुलवामा के शहीदों की उपेक्षा की है। पुलवामा हमले के बाद मारे गए जवानों के परिवारों को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए बने “वीर भारत कोर” फ़ंड में 36 घंटे के भीतर ही सात करोड़ रुपए जमा हो गए थे। आरटीआई के हवाले से यह पता चला था कि अगस्त 2019 तक इस फ़ंड में कुल 258 करोड़ रुपये जमा थे, बिहार के शहीद रतन के पिता पूछ रहे है कि “हमें अब सरकार से कुछ नहीं चाहिए। हमने देख लिया उनको। लेकिन सरकार केवल इतना बता दे कि जवानों के नाम पर जमा पैसे का क्या हुआ?”

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More