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ज़िंदगी में सिनेमा की तरह रि-टेक नहीं होता!

इरफ़ान के जाने का ग़म मैं अकेली नहीं, बल्कि पूरी दुनियाँ मना रही है, तब मैं भला कैसे कोई निजी शोक-पत्र लिखूँ। लाखों लोग हमारी इस दुःख की घड़ी में हमारे साथ खड़े हैं, तब मेरा यह व्यक्तिगत नुक़सान कहाँ! उनके जाने से हम सबको एक लाभ तो यह हुआ है, कि जो बातें उन्होंने (इरफ़ान ने) हमें सिखाई थीं, उन पर अब हम शिद्दत के साथ अमल करेंगे।
निश्चय ही यह हम सब के लिए अविश्वसनीय है, लेकिन मैं अगर इरफ़ान के शब्दों में कहूँ, तो कहूँगी, कि “यह जादुई है!” वह अब यहाँ है या नहीं, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है, कि वह हर चीज़ को टूट कर प्यार करता था। मेरी उससे सिर्फ़ एक ही शिकायत है, कि उसने मेरी ज़िंदगी में इतनी ख़ाली जगह कर दी है, कि अब मुश्किल है उसका भर पाना। उसने हर चीज़ को एक गति दी, लय दी, यहाँ तक कि विपरीत और अराजक हालात में भी वह दृढ़ रहा। इसीलिए मैंने अपने भोंडे सुर और गड्ड-मड्ड पड़ते पैरों के बावजूत गाना और नाचना सीख लिया।

हमारा जीवन पूर्ण था, एकदम परफ़ेक्ट। लेकिन फिर अचानक जीवन में कुछ ऐसी चीजों ने प्रवेश किया, कि सब कुछ ‘अघटित’ हो गया। बेतरतीन राइटिंग में लिखी गई चिकित्सकों की रिपोर्ट्स। लेकिन उन्हें भी पूर्णता से ग्रहण किया। इस दौरान कई लोग ऐसे मिले, जिनका ज़िक्र यहाँ बहुत ज़रूरी है। ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. नीतेश रोहतोगी (मैक्स अस्पताल साकेत, दिल्ली) जिन्होंने शुरुआती इलाज किया। और संकट की घड़ी में ढाढ़स बँधाने वाले डॉ. डेन क्रेल (यूके) एवं डॉ. शिद्रावी (यूके) तथा घुप अंधेरे में लालटेन बन कर आईं डॉ. सेवंती लिमये (कोकिला बेन अस्पताल)।

यह समझा पाना कितना मुश्किल है कि हमारी यह यात्रा कितनी शानदार, खूबसूरत, रोमांचक और दर्द भरी रही है। मुझे लगता है कि हमारा यह ढाई साल का दौर ख़ुद इरफ़ान की ज़िंदगी में भी काफ़ी रोमांचक रहा है। इस दौर की अपनी ओपनिंग थी, मध्यान्ह था और अंत भी। हमारे 35 साल के साथ से अलग यह दौर एक नई सीख दे गया, जिसके खेवनहार ख़ुद इरफ़ान थे। हमारी शादी एक गठबंधन था। हमारे छोटे से परिवार की नौका में हमारे दोनों बेटे बाबिल और अयान के साथ, इरफ़ान थे। और वही निर्देशित करते, कि “नौका उधर से नहीं इधर से मोड़ो”। पर जीवन कोई फ़िल्म नहीं है, यहाँ रिटेक नहीं होता। इसलिए मैं अपने बच्चों से यही कहूँगी, कि अब तुम लोग इस नौका को अपने पिता के मार्गदर्शन में तूफ़ान के बीच से निकाल कर लाओ। मैंने अपने बच्चों से यह भी कहा है, कि अपने पिता के सबक़ को वे सदा याद रखें।

बाबिल: ऊहा-पोह के भँवर से बाहर आओ बच्चे! और सृष्टि पर भरोसा करो।
अयान: अपने मन पर क़ाबू पाओ। और कोशिश करो, कि मन तुम पर न हावी होने पावे।

आंसू तो बहेंगे ही। पर उस रात की रानी के पौधे की तरह जिसकी ख़ुशबू सबको महका देती है। हम यह पौधा रोपेंगे, क्योंकि यह तुम्हारे पिता को बहुत प्रिय था। इसके पनपने में समय लगेगा, लेकिन एक दिन यह खिल जाएगा और खुशबू दूर तक फैलेगी। फिर जो लोग मिलेंगे, वे फ़ैन्स नहीं हमारे परिवार के लोग होंगे।

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