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फ़िलहाल तो लॉक डाउन अकेला इलाज है

कोविड-19 के दौर में लोगों की प्रश्नीय प्राथमिकताएँ लगातार बदल रही हैं। यह स्वाभाविक भी है। दो-तीन सप्ताह प्रश्न पहले विषाणु और उसके मारकत्व पर अधिक केन्द्रित थे , अब प्रश्नों के केन्द्रबिन्दु कुछ और हैं।
“लॉकडाउन कब ख़त्म होगा ? माली हालत कब ठीक होगी ?”
“आपके दोनों सवालों अलग-अलग हैं और उनके एक उत्तर की अपेक्षा न रखिएगा। माली हालत का सम्बन्ध वैश्विक , राष्ट्रीय और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं से है। उसे सुधरने में अभी ठीक-ठाक लम्बा समय लगेगा। लेकिन लॉकडाउन का अन्त समझने के लिए आपको कोविड-19 व उसकी जाँचों को तनिक समझना होगा।”

“जैसे ?”
“लॉकडाउन खोलने से पहले सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जनसंख्या में इस विषाणु के प्रसार की स्थिति क्या है। हम सभी लक्षणहीन किन्तु संक्रमित लोगों को नहीं पहचान पा रहे और जितनों की सूचना हमारे पास है , वह सम्पूर्ण नहीं है। ऐसे में एक ही तरीक़ा है जो हमें अपने समाज में विषाणु-प्रसार की धरातलीय स्थिति से अवगत करा सकता है।”

“और वह क्या है ?”
“वह है ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों की जाँच। टेस्ट जितने अधिक होंगे, समाज में विषाणु-प्रसार की उतनी सही जानकारी मिल सकेगी।”

“कौन सी जाँच ?”
“समाज के स्तर पर आरटी-पीसीआर की जाँच सम्भव नहीं। मुँह-नाक से द्रव का नमूना लेना , उसे ट्रांसपोर्ट करना और फिर प्रयोगशाला में इसकी जाँच करना — इन चरणों के साथ कई व्यावहारिक समस्याएँ हैं। ऐसे में समाज में बड़े पैमाने पर किये जाने वाले टेस्ट एंटीबॉडी-टेस्ट ही हैं। यानी लोगों के ख़ून के नमूनों में एंटीबॉडी नामक प्रोटीन को पहचानना। जिसके शरीर में पहले विषाणु दाखिल हो चुका होगा , उसके भीतर सात-दस दिन में एंटीबॉडी बनने लगेंगी। इस तरह से यह पहचान लिया जाएगा कि किसके शरीर में विषाणु आ चुका है अथवा मौजूद है। याद रखिए एंटीबॉडी-टेस्ट आरटी-पीसीआर की तरह सीधे विषाणु को नहीं पहचान रहा , यह उस प्रोटीन को पहचान रहा है , जो विषाणु के खिलाफ़ बन रही है। यानी आरटी-पीसीआर डायरेक्ट प्रमाण दे रहा है संक्रमण का , एंटीबॉडी-टेस्ट इनडायरेक्ट प्रमाण।”

“तो एंटीबॉडी-टेस्ट ही कराये जाएँ , समस्या क्या है ?”
“समस्या एंटीबॉडी-टेस्ट के स्तर पर भी कई है। पहली समस्या। जितने भी किट इस समय उपलब्ध हैं , उनमें सभी की गुणवत्ता अच्छी नहीं। ऐसे में घटिया किट से जाँच करने पर दो दिक्कतें हैं। लोग झूठमूठ में नेगेटिव निकल सकते हैं। ये नेगेटिव टेस्ट वाले लोग घर बैठे रहेंगे क्योंकि इन्हें यह लगेगा कि अभी इनके शरीर में विषाणु नहीं आया है। लेकिन इनसे अधिक ख़तरनाक वे लोग सिद्ध हो सकते हैं , जो झूठमूठ में पॉज़िटिव आ गये। यानी उनके शरीर में विषाणु तो कभी नहीं आया , किन्तु एंटीबॉडी-जाँच उन्हें पॉज़िटिव बता रही है। ऐसे लोगों को यह लगेगा कि बस , “हो गया इंफेक्शन। अब काहे का डर ! अब तो ठीक हो गये ! अब निकल सकते हैं घर से !”

” यानी जाँच झूठा आश्वासन दे सकती है ?”
“हाँ , दे सकती है। विशेषकर अगर अच्छी किट से न की जाए , तब।”

“तब किट अच्छी इस्तेमाल की जाएँ। इसमें क्या दिक़्क़त है ?”
“किट कौन सी अच्छी है — इसे भी तो तय करना होगा। इसमें भी कुछ समय लगता है। फिर अच्छी किट बनाम घटिया किट के प्रयोग में राजनैतिक इच्छाशक्ति बीच में फ़ैसला लेने लगती है। आप समझ रहे हैं न ?”
“हाँ , समझ रहा हूँ। लेकिन एक बात बताएँ। अगर सचमुच किसी को कोविड-संक्रमण हुआ हो , उसके शरीर में एंटीबॉडी भी बन गयी हों और एंटीबॉडी-टेस्ट भी सचमुच पॉज़िटिव आया हो , तब वह तो निश्चिन्त महसूस कर सकता है न ?”

“यहाँ भी एक बात कहना चाहता हूँ आपसे। सचमुच संक्रमण के बाद एंटीबॉडी की मौजूदगी के बाद भी यह कैसे तय हो कि इन एंटीबॉडी से सुरक्षा कितने दिन मिलेगी ? कैसे कोई डॉक्टर या वैज्ञानिक यह आश्वासन दे कि दुबारा संक्रमण नहीं होगा ? कितने दिन की सुरक्षा मिलेगी एंटीबॉडी से ? यही कारण है कि विश्व-स्वास्थ्य-संगठन जैसी संस्थाएँ एंटीबॉडी की उपस्थिति को कोविड-19 से पूर्ण व लम्बी सुरक्षा मानने को ग़लत बता रही हैं। वे कह रही हैं कि एंटीबॉडी-जाँच के पॉज़िटिव आने को कोविड-19 के खिलाफ़ इम्यूनिटी-पासपोर्ट समझना अभी जल्दबाज़ी और नादानी होगी। जबकि दुनिया-भर की अनेक सरकारें यह प्रचारित कर रही हैं कि एंटीबॉडी-जाँच अगर सचमुच पॉज़िटिव है ( यानी संक्रमण के बाद एंटीबॉडी बनी और एंटीबॉडी-टेस्ट पॉज़िटिव आया ) , तब आप सुरक्षित हैं और आप काम पर लौट सकते हैं। ऐसा सरकारी आश्वासन जोखिम-भरा है।”

“हाँ। समझ रहा हूँ। मान लीजिए कोई एंटीबॉडी-टेस्ट को पॉज़िटिव देखकर निश्चिन्त हो गया और काम पर लौट आया। और फिर उसे कोविड-संक्रमण हो गया। अब या तो पिछला टेस्ट झूठा पॉज़िटिव था अथवा इस बार उसे कोविड-19 का दूसरी बार संक्रमण हो गया है। एंटीबॉडी मौजूद थीं , पर रक्षा न कर पायीं।”

“जी , अब आप समझ रहे हैं समस्याओं को। लेकिन ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों की अच्छी किटों से एंटीबॉडी-टेस्टिंग ( और ज़रूरत पड़ने पर आरटी-पीसीआर टेस्टिंग ) से हम जनसंख्या में इस विषाणु के वितरण को समझ सकेंगे। जब यह समझ आएगी , तभी यह पता चलेगा कि कितने लोग कम-से-कम एक बार संक्रमित हो चुके हैं। फिर इसी से यह निर्णय लिया जा सकेगा कि कहाँ लॉकडाउन अपेक्षाकृत ढीला किया जा सकता और कहाँ नहीं। प्रशासनिक निर्णयों का रास्ता अधिकाधिक टेस्टिंग के रास्ते से होकर जाता है , जिसे अच्छी किटों से किया गया हो। टेस्टिंग से जनसंख्या-विषाणु-प्रसार व प्रतिरक्षा की समझ , समझ से लॉकडाउन खुलने के निर्णय और इस निर्णय से अर्थव्यवस्था में सुधार का आरम्भ। इसी आरम्भ से आपकी माली हालत सुधरेगी। समझे अब ?”

“समझ गया। अनेक किन्तु-परन्तु हैं , जिनसे जूझना है।”
“जी। दवा कोई पुख़्ता तौर पर अभी है नहीं। टीका बनने में काफ़ी समय लगेगा , ऐसा लगता है। जाँचों की व्यावहारिक समस्याओं पर हम बात कर ही चुके। प्लाज़्मा-उपचार प्रायोगिक स्तर पर किया जा रहा है। ऐसे में रोकथाम के सामान्य परम्परागत उपाय ही फ़िलहाल सफल विकल्प हैं। सामाजिक ( भौतिक ) दूरी , हाथ बार-बार धोना , चेहरा न छूना , मास्क पहनना और इंतज़ार करना।”
“वही कर रहे हैं घर बैठकर। इंतज़ार।”
“हाँ , लेकिन धैर्य बनाये रखिए। यह महामारी मनुष्य के धैर्य और विवेक की भी परीक्षा ले रही है।”

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