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प्रधानमंत्री जी आपने सवालों से मुँह क्यों मोड़ा!

शंभुनाथ शुक्ल

आज दोपहर तक चुनाव रैली में दहाड़ने वाले प्रधानमंत्री कुछ ही घंटे बाद ऐसी चुप लगा गए, कि संवाददाताओं के सारे सवालों को टाल दिया. जबकि संवाददाता सम्मेलन खुद उनकी पार्टी ने बुलाया था. दरअसल आज से 17 वीं लोकसभा का प्रचार समाप्त हो गया. रविवार को बाकी बची 59 लोकसभा सीटों पर मतदान हो जाएगा. शायद इसीलिए भाजपा ने प्रेस कांफ्रेंस की. इसमें प्रधानमंत्री भी पहुँचे, लेकिन उन्होंने संवाददाताओं के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया. सवालों का जवाब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने दिया. जो सवाल प्रधानमंत्री से पूछे गए, उनका भी जवाब पार्टी अध्यक्ष ने ही दिया. इससे एक आशंका तो यह पैदा हो गई, कि क्या प्रधानमंत्री निराश हो गए हैं? क्या उन्हें लग रहा है, कि इस चुनाव में उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ेगा? रेडियो पर अपने ‘मन की बात’ करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्यों हताश नज़र आए? यह एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. वे नरेंद्र मोदी जो, कि चुनावी रैलियों में उत्साह से लबालब थे. वे अचानक सवालों से मुँह क्यों मोड़ गए? प्रधानमंत्री ने इस संवाददाता सम्मेलन में भी सिर्फ ‘मन की बात’ बता दी, कि भाजपा ही सरकार बनाएगी, और ‘थैंकयू वैरी मच’ बोल कर चुप साध गए.

उधर प्रधानमंत्री की इस इस्टाइल पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने फ़ौरन सवाल खड़े कर दिए. उन्होंने कहा है, कि प्रधानमंत्री हार की आशंका से डर गए हैं. राहुल गांधी ने आखिरी दौर के प्रचार में प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की आक्रामकता की तारीफ़ की. उनके अनुसार इसी दौर में भाजपा के समक्ष हार का संकट खड़ा हो गया है. हो सकता है, इसे राहुल गांधी द्वारा अपना मनोबल बढ़ाने की ‘कला’ बताया जाए. लेकिन इस बात पर कोई शक नहीं कि भाजपा के संवाददाता सम्मलेन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “बॉडी लैंग्वेज़” कहीं न कहीं उनकी आशंकित पराजय के भय का संकेत कर रही थी. ज़ाहिर है, इससे एक निष्कर्ष तो यह निकलता है, कि प्रधानमंत्री थक चुके हैं, इसीलिए वे संवाददाताओं के सवालों को टालते रहे. दूसरा निष्कर्ष यह निकलता है, कि नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बताने का जो अभियान आरएसएस ने चलाया हुआ है, उसके चलते प्रधानमंत्री ‘डिफेंसिव’ हो गए. तीसरा नतीजा यह निकला, कि आरएसएस से संकेत मिल गया है, कि यदि किसी तरह जोड़-तोड़ कर भाजपा ने सरकार बना भी ली, तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे. जो आदमी अभी कल तक 50 वर्षों तक भाजपा और मोदी राज बना रहने का सन्देश दे रहा था, उसने हार कैसे स्वीकार कर ली? इसके लिए पिछले पंद्रह दिनों के डेवलपमेंट को देखना होगा.
बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर पाकिस्तान को सबक सिखाने या हर एक को डराने-धमकाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री को ममता, माया और राहुल ने ऐसा घेरा कि उनकी बोलती बंद हो गई. उत्तर प्रदेश में पश्चिम भले उनके साथ जाता दिखा हो, लेकिन पूरब में हालत बदल गए थे. प्रियंका गांधी ने उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश में ऐसा घेरा कि भाजपा के सवर्ण वोट बैंक, खासकर ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा उससे छिटक गया. ब्राह्मणों को प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि दिखी और वह भाजपा से स्वतः दूर हो गया. इसके बाद बाक़ी कसर भोपाल से भाजपा उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने पूरी कर दी. कट्टरपंथी प्रज्ञा आरएसएस की हिन्दुत्त्ववादी चेहरा हैं. उन्होंने नाथूराम गोडसे को शहीद बता कर एक तरह से महात्मा गांधी का अपमान कर दिया. इस देश की जनता महात्मा गांधी को नहीं भूल सकती. दरअसल फिल्म अभिनेता कमल हासन ने नाथूराम गोडसे को पहला हिंदू आतंकी बताया था. इसी को डिफेंड करने में प्रज्ञा ठाकुर फंस गईं. इसके बाद माया और ममता ने भाजपा को ऐसा घेरा कि अमित शाह को बंगाल से भागना पड़ा.
कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की इस हताशा से यह लग रहा है कि उन्होंने भी अब भाजपा की पराजय लगभग स्वीकार कर ली है. न्यूज़-24 को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि प्रज्ञा ठाकुर को कभी वे माफ़ नहीं कर पाएंगे. पर प्रधानमंत्री जी अब चीज़ें हाथ से निकलने लगी हैं. यह आपने चुप रहकर साबित कर दिया, क्योंकि चुप रहना आपकी आदत नहीं है.

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