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अब काहे का मई-दिवस!

मुझे कानपुर का होने पर गर्व है! कनपुरिया कहे जाने पर भी! कुछ लोग हमें मघैया कह देते हैं, उस पर भी मुझे फ़ख़्र है। 1978 में मैं रविवार के लिए इंटरव्यू देने कलकत्ता गया था। तब मेरे साथ जो बाक़ी दो साथी कानपुर से गए थे, उनमें से एक संतोष तिवारी (अब दिवंगत) ने कहा, कि सभी को लखनऊ का निवासी बताना, कानपुर का नहीं। मैंने मना कर दिया। मुझे ठीक नहीं लगा, कि मैं फ़ालतू में लखनौआ बनूँ। बाबुओं के शहर का निवासी मैं नहीं बनना चाहता। कानपुर यानी मेहनतकश मज़दूरों का शहर। रोज़ सुबह मिलों के भोंपू से नींद खुलती और हम चिमनियों से निकलने वाले धुएँ से बेचैन भी रहते। लेकिन वही इस शहर की पहचान थी। ख़ुशबू थी। ‘हर ज़ोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है!’ सुनकर लगता, कि हड़ताल हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

हर साल एक मई को फूलबाग के मैदान में रैली होती। इसी में मैं कामरेड ईएमएस नम्बूदारीपाद, बीटी रणदिवे और ज्योति बसु को देखा था, सुना था। फूलबाग मैदान की क्षमता 85 हज़ार की है, लेकिन लाखों की संख्या में मज़दूर बिरहाना रोड, माल रोड, नानाराव पार्क में जमा रहते। पेड़ों पर चढ़ जाते। ईएमएस हकलाते थे, लेकिन उनकी इस हकलाहट से उनकी दहाड़ न रुकती। ऊपर से हिंदी न वे बोल पाते न ठीक से समझ पाते, इसलिए एक दुभाषिया उनकी स्पीच को समझता चलता। मुझे आज भी याद है, उनका वह भाषण, जिसमें उन्होंने कहा था, कामरेड यह कितने दुर्भाग्य की बात है, कि हम एक ही देश में रहते हुए एक-दूसरे की भाषा से अनजान हैं। लेकिन हमारी लड़ाई एक है। हमारा शत्रु कामन है। वैसी ही दहाड़ और कोई नेता नहीं लगा सका। कामरेड ज्योति बसु भी अंग्रेज़ी में बोलते लेकिन उनकी वह मास अपील नहीं थी, जो ईएमएस की थी। बीटी रणदिवे तो प्रखर बौद्धिक व्यक्ति थे, लेकिन मज़दूरों के हक़ की लड़ाई लड़ने वालों में सबसे आगे। पर जैसे-जैसे मिल के भोंपू बंद हुए, मज़दूरों की लड़ाई भी धीमी पड़ती गई। मज़दूर दिवस का उल्लास भी काम पड़ता गया।

आज मज़दूर दिवस एक रस्म है। संगठित मज़दूर रहे नहीं और उदारवाद ने मज़दूरों की एकता को तोड़ दिया। ‘बोल मजूरा हल्ला बोल!’ अब कोई नहीं बोलता। कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी सुविधाभोगी होती चली गईं। अब कोई ईएमएस नहीं होगा, न बीटी न कामरेड ज्योति बसु, न कामरेड रामासरे, जो कानपुर की पहचान थे। मुझसे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री कामरेड बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कहा था, कि आप सौभाग्यशाली हो जो कानपुर के हो। वह कानपुर जो कामरेड रामासरे का है और जिन्हें कामरेड माओत्सेतुंग पहचानते थे। अब नहीं रहा वह कानपुर। अब जो कानपुर बचा है, वह किसके लिए जाना जाएगा!

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