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राइट ऑफ़ यानी पैसे वालों का ऋण माफ़!

दो तीन दिनों से देख रहा हूँ कि कुछ सेल्फ़ डिक्लेयर्ड अर्थशास्त्री ‘राईट ऑफ़ ऋणमाफ़ी नहीं है’ के नारे के साथ मैदान में उतरे हैं। तड़पते भक्तों के लिए आई टी सेल ऐसे नशीले उत्पाद देता रहता है ताकि वे भक्ति के नशे में सराबोर रहें।

ख़ैर थोड़ी तकनीकी बात कर लेते हैं। राइट ऑफ़ होता क्या है? थियरी यह है कि बैंक ऐसे ऋणों को बट्टा खाते में डाल देते हैं जिन्हें टाक्सिक या बैड लोन कहा जाता है। यानी ऐसे लोन जिनका पैसा वापस नहीं आ रहा हो, जिनके वापस आने की उम्मीद न हो। बट्टा खाता में डालने या राइट ऑफ़ करने के बाद ये लोन बैंक की बैलेंसशीट से बाहर हो जाते हैं जिससे बैंक की साख बनी रहती है और उनकी ओवरऑल टैक्स लाएबिलिटी कम हो जाती है। उदाहरण के लिए मान लीजिए किसी बैंक ने पाँच लाख करोड़ के ऋण दिए हैं और इसमें बीस हज़ार करोड़ के ऋण राइट ऑफ़ कर दिए गए तो नेट वैल्यू इतनी कम हो जाएगी और बैंक को उसी पर कर देना होगा। रिज़र्व बैंक कहता है कि राइट ऑफ़ बैंकों द्वारा अपनी बैलेंसशीट की नियमित सफ़ाई की तकनीक है और सिद्धांत रूप में राइट ऑफ़ की गई राशि अब भी वसूली जानी है। ज़ाहिर है कि इसे आयकर अधिनियम 1961 के तहत किया जाता है।

लेकिन असल में क्या होता है? अव्वल तो यह सिर्फ़ रईसों को दी जाने वाली सुविधा है। किसी किसान का ऋण कभी राइट ऑफ़ होते सुना है? उसे तो इतना परेशान किया जाता है कि वह आत्महत्या कर लेता है। दूसरे, जिन पूँजीपतियों का ऋण राइट ऑफ़ किया जाता है, वे कभी उसे पूरा वापस नहीं करते। या तो उन कम्पनियों को दीवालिया दिखा दिया जाता है या फिर मोलतोल से बड़ा हिस्सा कटवा कर थोड़ी सी राशि चुकाकर मामला ख़त्म किया जाता है। नई आर्थिक नीतियाँ लागू होने के बाद से ही पूँजीपतियों में यह चलन बढ़ा है और पिछली बार कुछ बैंकों के संकट में आने पर हमने देखा कि कैसे बैंक प्रबंधन और पूँजीपतियों की साँठ गाँठ से इसका उपयोग पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए किया गया था और जब बैंक संकट में आए तो लाइनों में लगे वे लोग जो नियम से क़र्ज़ का भुगतान करते हैं।

असल बात यह है कि राइट ऑफ़ को पूँजीपतियों की ऋण माफ़ी का चोर दरवाज़ा बना दिया गया है।

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