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यहाँ से हुआ था कामसूत्र का जन्म…

कानपुर (Kanpur)- 375 ईस्वी में जब कैथलिक चर्च नियम-कायदे तय कर रहा था, तो सेक्स को पाप माना गया, इसे गंदा और फिजूल की चीज कहा गया, इसे सिर्फ संतानोत्पति तक उचित बताया गया था। लेकिन लगभग उसी दौरान गंगातट पर वात्स्यायन कामसूत्र की रचना कर रहे थे। वह बता रहे थे कि काम एक अच्छी चीज है और यह भी समझा रहे थे कि किस तरह यौनिक आऩंद को बढ़ाया जा सकता है।

जाहिर है कि प्राचीन भारत में सेक्स पर खुलकर बात होती थी और उसका बड़ा सबूत वास्तुकला के कई नमूने भी हैं। यह अलग बात है कि अब तो सेक्स शिक्षा के जिक्र पर ही कई सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। इसे हौवा बना दिया है, जिस पर बात करना, समझना और समझाना बुरा माना जाता है। शायद यही कारण है कि कई युवा भटक जाते और फिर वे या तो अवसाद में चले जाते या फिर गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। वे नहीं जानते कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं।

कोई एक हजार साल पहले खजुराहो में 85 मंदिर बनवाए गए, जिसमें 22 ही अब सुरक्षित और संरक्षित हैं। 1986 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया गया था। यहां काम कलाओं को दर्शाती इन कलाकृतियों को शिल्पकारों का अद्भभुत कौशल माना गया है। अब यह एक बड़ा पर्यटन केंद्र है, जहां दुनिया भर के लोग इसे देखने आते और तारीफ करते नहीं अघाते हैं। आठवीं सदी के आसपास अजंता-एलोरा की गुफाओं में कई चित्र उकेरे गए जो सेक्स की परिभाषा उजागर करते हैं। ओडीशा में कोणार्क के सूर्य मंदिर में भी एसे की चित्रों की बहुतायत है। माउंट आबू के पास दिलवाड़ा के मंदिरों में तो समलैंगिग सेक्स के चित्र भी देखे जा सकते हैं।

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यूं तो भारत में सेक्स पर कई ग्रंथों की रचना हुई, लेकिन सबसे प्रामाणिक ग्रंथ कामसूत्र ही माना जाता है। इसमें वात्यायन ने सेक्स के हर पहलू की व्याख्या प्रमाणिक तरीके से की है। वह बताते हैं कि चरम सुख के लिए क्या जरूरी है। स्त्री और पुरुष दोनों को ही चरम सुख की चाह होती है। पुरुषों में सेक्स का अहसास जल्दी जागता है। उसमें यह आग की तरह नीचे से उठकर ऊपर की ओर यानी दिगाम तक बहुत ही तेजी से पहुंचता है। यही कारण उसमें सेक्स आग की तरह भड़कता है और शीघ्र ही बुझ भी जाता है। दूसरी तरफ स्त्री में यह दिमाग से उत्पन्न होकर धीरे-धीरे नीचे तरफ आता है, बिल्कुल पानी के प्रवाह की तरह। स्त्री में यह भावना जागने में देर लगती है और शांत भी देर से होती है। वात्यायन सेक्स में आसन के महत्व को भी बताते हैं।

पौराणिक कथाओं में भी प्रेम और यौन संबंधों का जिक्र मिलता है। इंद्र तो ऋषि गौतम की पत्नी पर मुग्ध हो गए थे। नैसर्गिक प्रेम को समझने के लिए राधा-कृष्ण का उदाहरण है। कृष्ण हमेशा राधा के साथ नजर आते हैं और पूजे जाते हैं। कहीं भी उनकी पत्नी रुकमणि नहीं दिखतीं। राधा और कृष्ण के प्रेम और उनकी प्रेम लीलाओं पर न जाने कितने काव्य लिखे गए और कविताएं सुनी-सुनाई जाती हैं। शकुंतला और दुष्यंत की प्रेमकथा पर भी कई रचनाएं लिखी गईं।

यूनानी नाटककार की यह कहानी भी प्रचलित है कि कभी मानव संपूर्ण हुआ करता था। इसी संपूर्णता ने उसे इतना शक्तिशाली बना दिया कि वह इतराने लगा और एक वक्त एसा भी आया कि उसने देवताओं को भी चुनौती दे दी। तब देवाताओं के राजा जायस ने इससे निपटने के लिए विचार किया और मानव को दो भागों में विभाजित कर दिया। तब वह सीधा खड़ा होने लगा। इसी विभाजन ने उसे स्त्री और पुरुष में बदल दिया। जो स्त्री के पास था, वह पुरुष के पास नहीं और पुरुष के पास था वह स्त्री के पास नहीं। इसी से दोनों के बीच आकर्षण पैदा हुआ और वे एक-दूसरे की ओर खिंचने लगे। यह मानव प्रकृति है कि जो वस्तु हमारे पास नहीं होती, हमें उसकी चाह होती है और कभी-कभी उसकी दीवानगी इस कदर बढ़ जाती है कि कोई हद से गुजर जाता है। अपूर्णता ही संपूर्णता के लिए ललक पैदा करती है। स्त्री को पाकर वह संपूर्णता होती है। शायद यही कारण कि पूजा-पाठ में कई बार पति-पत्नी को साथ बैठाया जाता है, ताकि विधान पूर्ण हो सके। अर्द्धनारेश्वर भगवान के मंदिर भी इसकी पुष्टि करते हैं। यहां यह भी विचार करने की बात है कि यदि स्त्री और पुरुष न मिलें तो मानव का जन्म कैसे हो। यानी दोनों मिलकर पूर्ण होते हैं और तभी मानव की रचना होती है। यह वैज्ञानिक तथ्य है।

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सभ्यता आई तो समाज ने सेक्स के लिए नियम-कानून भी तय कर किए गए। विवाह प्रथा ने जन्म लिया। पश्चिमी सभ्यता के खुलेपन ने इसमें विकार पैदा किया और एक वक्त वह भी आया जब इससे विरक्ति होने लगी। आचार्य रजनीश की पुस्तक “संभोग से समाधि” तक का दर्शन बहुत कुछ विस्तार और गहराई से इस बारे में बताता है। अब फिर वक्त आया है कि सेक्स पर चर्चा शुरू हो गई है। सेक्स एजूकेशन पर जोर दिया जा रहा है। झिझक और संकोच खत्म कर विमर्श हो रहा है। इसे जरूरी समझा जा रहा है और इस मुद्दे पर बात हो रही है। यह जागरूकता है। कई महानगरों में लड़के लड़कियों की लाइफ स्टाइल बदल रही है। “लिव-इन-रिलेशनशिप” स्वीकार्यता की ओर है। स्त्री स्वतंत्रता पर बात हो रही है। वे फैसले ले रही हैं। फिल्म मिक्स डबल, पेज थ्री, जिस्म, मर्डर जैसी फिल्में बदलते दौर की कहानी कहती हैं।

कथित तांत्रिक, चिकित्सक, नीम-हकीम और न जाने कितने अज्ञानी सेक्स समस्याओं का समाधान करने के नाम पर दुकानें चला रहे हैं। न जाने कितनी दवाएं सेक्स पावर बढ़ाने के नाम पर बेची जा रही हैं। यह अरबों का कारोबार है। शायद ही कोई एसा दिन हो जब प्रिंट और सोशल मीडिया में इस तरह विज्ञापन न दिखते हों। इस कारोबार में लुटापिटा, ठगा कोई व्यक्ति लोकलाज, शर्म और संकोच के कारण शिकायत भी नहीं करता।

वेलेंटाइन डे को यूं तो प्रेम उत्सव के रूप में परिभाषित किया जाता है, लेकिन इसके पीछे कई कहानियां सामने आ ही जाती हैं। यदि एसा न होता तो “किस डे”, “हग डे” और फिर “स्लैप डे” क्यों? बेहतर हो कि युवाओं को सेक्स पर शिक्षित किया जाए, उन्हें भले और बुरे का भेद बताया जाए। सेक्स को पाप समझने के बजाय इसके अन्य सभी पहलुओं को समझाया जाए। यदि एसा नहीं किया तो इस नेटयुग में वाट्सएप यूनिवर्सिटी की शिक्षा युवाओं को अंधकार में धकेल देगी, जहां सिर्फ अवसाद और बर्बादी के अलावा कुछ भी नहीं…।

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