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कड़कनाथ मुर्गे के लिए दो राज्यों में हो गई थी कानूनी लड़ाई 2 Kadaknath chicken

कड़कनाथ मुर्गे के लिए दो राज्यों में हो गई थी कानूनी लड़ाई

कड़कनाथ मुर्गा मूलत: मध्य प्रदेश राज्य के झाबुआ, अलीराजपुर और धार जिले के कुछ भागों में पाया जाता है. छत्तीसगढ़ द्वारा भी कड़कनाथ मुर्गे पर GI टैग की मांग की जा रही थी. लेकिन अंतत: मध्य प्रदेश के दावे को मान्यता दी गई. कड़कनाथ मुर्गा मेलानिन के कारण काले रंग का होता है. इसलिये इसे कालीमासी भी कहा जाता है.

इसके पंख, माँस, हड्डियाँ और खून भी काले रंग के होते है. सामान्य मुर्गे का खून लाल रंग का होता है. यह औषधीय गुणों से युक्त होता है. तथा यह मुर्गे की अन्य प्रजातियों से अधिक पौष्टिक और सेहत के लिये लाभकारी होता है. जहाँ अन्य मुर्गो में 18-20% प्रोटीन पाया जाता है वहीं, कड़कनाथ मुर्गे में 25% प्रोटीन पाया जाता है. इसमें कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अपेक्षाकृत कम पाई जाती है और आयरन अधिक मात्रा में पाया जाता है. चिकन की अन्य किस्मों की तुलना में कड़कनाथ मुर्गे का उच्च-प्रोटीन युक्त माँस, चूजे और अंडे बहुत ज़्यादा कीमत पर बेचे जाते हैं.

कड़कनाथ मुर्गा आम चिकन की तुलना में महंगा बिकता है. जहाँ आम चिकन 300 रूपए प्रति किलो है वही कड़कनाथ चिकन के 1 किलो चिकन करीब 1000 रूपए तक बिकता है. ये कई बीमारियों से लड़ने में कारगर है. ये अपने स्वाद और सेहतमंद गुणों के लिये अधिक मशहूर है. कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले मांस वाला चिकन है.

मांस और खून दोनों काले रंग का होते है और अन्य चिकन की तुलना में इस चिकन में कोलेस्ट्रॉल भी बहुत कम होता है. कड़कनाथ मुर्गी का अंडा भी लगभग 50 रूपए का बिकता है. ये मुर्गा आम चिकन की तुलना में ये मुर्गा जल्दी बड़ा होता है और करीब 3 – 4 महीने में वयस्क हो जाता है.

GI पंजीकरण के लाभ

यह भारत में भौगोलिक संकेतक के लिये कानूनी संरक्षण प्रदान करता है. दूसरों के द्वारा किसी पंजीकृत भौगोलिक संकेतक के अनधिकृत प्रयोग को रोकता है. यह भारतीय भौगोलिक संकेतक के लिये कानूनी संरक्षण प्रदान करता है जिसके फलस्वरूप निर्यात को बढ़ावा मिलता है. यह संबंधित भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादित वस्तुओं के उत्पादकों की आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देता है.

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