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Maharashtra: कौन रहा विलेन..! भतीजे ने छीन ली पवार की ‘पॉवर’

Maharashtra: राजनीति बड़ी विचित्र चीज़ होती है। यहाँ कोई भी भविष्यवाणी अटकल ही होती हैं। किसके मन में क्या चल रहा है, कुछ पता नहीं चलता। कल देर रात तक शिवसेना, एनसीपी तथा कांग्रेस के नेता महाराष्ट्र में अपनी सरकार बन जाने की खुशी में डूबे थे, कि अचानक पासा पलट गया।

महाराष्ट्र (Maharashtra): कल रात ही तय हो गया था, कि सुबह शिवसेना के सुप्रीमो उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, और एनसीपी तथा कांग्रेस के विधायक उन्हें सपोर्ट करेंगे। सहमति का फार्मूला भी निकाल आया था। परस्पर 14-14-14 मंत्री तीनों पार्टियों के हों, इस पर मुहर लग गई थी। लेकिन रात की किस घड़ी में उद्धव के सामने से थाली खींच ली गई, पता ही नहीं चला। सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस ने और डिप्टी सीएम बने एनसीपी के अजित पवार, जो कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के भतीजे हैं। उद्धव कोमा में चले गए हैं, और उनके प्रवक्ता संजय राउत सूफियाना शेर कह रहे हैं।

राजनीति बड़ी विचित्र चीज़ होती है। यहाँ कोई भी भविष्यवाणी अटकल ही होती हैं। किसके मन में क्या चल रहा है, कुछ पता नहीं चलता। कल देर रात तक शिवसेना, एनसीपी तथा कांग्रेस के नेता महाराष्ट्र में अपनी सरकार बन जाने की खुशी में डूबे थे, कि अचानक पासा पलट गया। शरद पवार के भतीजे और एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार रातो-रात 22 विधायकों को लेकर भाजपा से जा मिले। और राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने भाजपा विधायक दल के नेता देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी।

महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 21 अक्टूबर को चुनाव हुए थे और 24 अक्टूबर को परिणाम आए थे। चुनाव में बीजेपी को 105, शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं। किसी भी पार्टी या गठबंधन के सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करने के बाद 12 नवंबर को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। इसी बीच शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने एक साझा मंच बनाकर आज सुबह शिवसेना के उद्धव की अगुआई में सरकार बना लेने का निर्णय लिया था। लेकिन रात ही अजित पवार 22 विधायकों को लेकर भाजपा के साथ चले गए। अब सवाल यह उठता है, कि राज्य में बहुमत के लिए 145 विधायक चाहिए। मगर अभी तो संख्या सिर्फ 128 तक ही पहुंची है, तब वे कौन से विधायक हैं, जिनके बूते भाजपा अपना बहुमत साबित करेगी? और राज्यपाल भाजपा के बहुमत के दावे से आश्वस्त कैसे हुए? फिर सब कुछ इतना गुप-चुप तरीके से कैसे शपथ दिलाई गई? इसका सीधा-सीधा अर्थ है, कि परदे के पीछे से कोई खेल चल रहा था। यह खेल कौन रच रहा था?

इसका एक जवाब है, कि अमित शाह की कूटनीति और दूसरा जवाब है, शरद पवार की कुटिल चाल। शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं। वे पहले भी ऐसे खेल करते रहे हैं। 1978 में उन्होंने वसंतदादा पाटिल की सरकार के नीचे से ज़मीन खिसका दी थी। इमर्जेंसी के ठीक बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की बुरी हार हुई थी। महाराष्ट्र में भी पार्टी को काफी नुकसान हुआ, जिसके बाद तत्कालीन सीएम शंकरराव चव्हाण ने इस्तीफा दे दिया और वसंददादा पाटिल मुख्यमंत्री बने। बाद में उसी साल कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई जिसमें से एक धड़े कांग्रेस (यू) में शरद पवार के राजनीतिक गुरु शंकरराव चव्हाण शामिल हुए, जबकि इंदिरा के नेतृत्व वाले धड़े कांग्रेस (आई) ने अलग राह अपना ली।

1978 की शुरुआत में सूबे में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दोनों ही धड़ों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, लेकिन किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं आया। इन चुनावों में कांग्रेस की प्रतिद्वंदी जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई, लेकिन उसके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें नहीं थीं। ऐसे में जनता पार्टी को रोकने के लिए कांग्रेस के दोनों धड़े एक बार फिर साथ आ गए और वसंतदादा पाटिल के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी। 1978 अभी बीता भी नहीं था कि महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा सियासी भूचाल आया। शरद पवार ने जुलाई 1978 में कांग्रेस (यू) पार्टी को तोड़ दिया और जनता पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बना ली। इस तरह वे महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्यमंत्री बन गए। हालांकि पवार कुर्सी पर बहुत ज्यादा समय नहीं बिता पाए, और सत्ता में वापसी करते ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पवार की सरकार को बर्खास्त कर दिया। वह पहली बार 18 जुलाई 1978 से लेकर 17 फरवरी 1980 तक (एक साल 214 दिन) ही मुख्यमंत्री रह पाए।

चार दशक बाद शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने उनसे अलग रहा पकड़कर उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पहले खबरें आ रही थीं कि अजित के इस कदम को शरद का समर्थन प्राप्त है, लेकिन बाद में खुद एनसीपी प्रमुख ने इसका खंडन कर दिया। उन्होंने ट्वीट किया, ‘अजित पवार का बीजेपी को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने का फैसला उनका निजी फैसला है, नैशनलिस्‍ट कांग्रेस पार्टी का इससे कोई संबंध नहीं है। हम आधिकारिक रूप से यह कहना चाहते हैं कि हम उनके इस फैसले का न तो समर्थन करते हैं और न ही सहमति देते हैं।’

लेकिन शरद पवार के इस ट्वीट पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा है। इसकी वजह भी हैं। एक तो अभी शीतकालीन सत्र के पहले ही रोज़ संसद में प्रधानमंत्री ने शरद पवार की खूब तारीफ़ की थी। दूसरे सोनिया से मिलने के पूर्व शरद मोदी से भी मिले और डेढ़ घंटे लम्बी वार्ता की। अब वे कह रहे हैं, कि चूँकि अजित पवार ही विधायक दल के नेता हैं, इसलिए सूची उनके पास होगी! बहरहाल महाराष्ट्र की राजनीति में इतनी तेजी से उठापटक हुई, कि किसी की बात पर कोई भरोसा नहीं कर रहा, ख़ासकर शरद पवार की सफ़ाई पर। अधिकतर राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं, कि हो न हो बीजेपी के सत्ता में लौटने की स्क्रिप्ट शरद पवार ने ही तैयार की थी।

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