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बड़े हनुमान मंदिर में लेटे हुए हनुमान की प्रतिमा के पीछे की कहानी

hanuman

प्रयागराज(Prayagraj): देश में मनगढ़न्त कथाओं के आधार पर रोज नई कहानियाँ बनती है. इनमें से कुछ सच होते हैं तो कुछ झूठ. ऐसी ही कुछ मान्यता है प्रयागराज क्षेत्र के संगम तट पर स्थित पुराण प्रसिद्ध लेटे हुए हनुमान (hanuman) जी के विषय में हैं. यह मंदिर धरती का एक मात्र मंदिर है जिसका विवरण पुराणों में विषद रूप से प्राप्त होता है.

मंदिर की विशेष्ता
हनुमान जी का यह प्राचीन मंदिर त्रिवेणी संगम के निकट किला के किनारे स्थित है. इस मंदिर में हनुमानजी की दक्षिणाभिमुखी विशाल मूर्ति है, जो 6-7 फुट नीचे है. मूर्ति का सिर उत्तर और पैर दक्षिण दिशा में है. इसे बड़े हनुमान जी, किला के हनुमान जी और बांध वाले हनुमान जी भी कहा जाता है. यहां मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है. भक्त दर्शन-पूजन कर निशान चढ़ाते हैं. मंदिर का प्रबंधन बाघंबरी गद्दी की ओर से किया गया जाता है.

प्रतिमा के लेटे होने की कहानी
मंदिर के बारे में मान्यता है कि हनुमान जी के बाएं पैर के नीचे कामदा देवी और दाएं पैर के नीचे अहिरावण दबा हुआ है. दायें हाथ पर श्रीराम और लक्ष्मण और बाएं हाथ में गदा सुशोभित है. ऐसी मान्यता है कि लेटे हनुमान जी भक्तों की सभी मनोकामना पूरी करते हैं. इस मंदिर में लेटे हनुमान जी को लेकर मान्यता है कि यह मंदिर लगभग 600-700 वर्ष प्राचीन है. कहा जाता है कि कन्नौज के एक राजा को कोई सन्तान नहीं थी. वे सन्तान प्राप्ति के लिये गुरु आश्रम गये और गुरु ने आदेश किया कि राजन अपने राज्य में हनुमान की प्रतिमा स्थापित करे. इसका स्वरूप ऐसा हो जो पाताल में भगवान रामजी को छुड़ाने के लिये गये थे और यह विग्रह कहीं और से नहीं विंध्य पर्वत से बनवाकर लाया जाए.

राजा का दुख
तब राजा कन्नौज से विंध्याचल पर्वत की ओर गये और वह इस प्रतिमा को स्वरूप देकर नाव के द्वारा अपने राज्य को लेकर आए. वहीं प्रतिना को लाते समय रास्ते में प्रयाग का क्षेत्र आया. राजा ने नाव को प्रयाग में घाट पर किनारे लगाकर रात्रि विश्राम का निर्णय लिया. तभी रात को अचानक नाव टूटी और हनुमान जी का विग्रह जलमग्न हो गया इस दृश्य को देखकर राजा बहुत दुखी हुए और सकुशल अपने राज्य लौट गये.

कई वर्षों बाद गंगा का जलस्तर घटा तब एक राम भक्त बाबा बालगिरी जी महराज ने संगम भूमि पर अपना त्रिशूल गाड़कर धूनी जमाने का प्रयास किया. उसी धूनी को खोदते समय रेत के नीचे कुछ टकराने की आवाज आई तब बाबा बालगिरी जी महाराज ने उस पूरे विग्रह को खोदकर कर बाहर निकाला. पूरे विग्रह को देखकर बाबा बहुत प्रसन्न हुए और मन ही मन भगवान राम के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने लगे. उन्होंने हनुमान जी की पूजा करनी शुरू कर दी. उस समय बहुत अधिक प्रतिमाओं का प्रचलन नहीं था इसलिए हनुमान जी के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त आने लगे.

मूर्ति को नहीं निकाल सके सैनिक
वहीं मुगलकाल के समय में हिंदुओं के बड़े-बड़े तीर्थ स्थानों को तोड़कर नष्ट करने का कार्य चल रहा था. उस समय मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस मंदिर के बारे में सुना तो यहां आया और अपने सैनिकों को आदेश दिया कि प्रतिमा को निकालकर फेंक दिया जाए. सैनिक प्रतिमा को उठाने में लगे थे तब बाबा बालगिरी मन ही मन विलाप कर हनुमान जी महराज से प्रार्थना करने लगे. तब हनुमान जी ने बहुत अद्भुत चमत्कार दिखाया और जैसे-जैसे सैनिक प्रतिमा को उठाने का प्रयास करते वैसे प्रतिमा और धरती पर बैठती गई. कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा लेकिन सैनिक प्रतिमा का बाल भी बांका नहीं कर पाए.इस मंदिर की काफी मान्यताएं हैं. इस कारण यहां दूर-दूर से लोग आते हैं. हनुमान जी की दर्शन मात्र भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं.

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