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इस शिव मंदिर में रातों रात बदल जाती है त्रिशूल की दिशा

प्रयागराज(Prayagraj): प्रत्येक महीने के पूर्णिमा की रात को सोमेश्‍वरनाथ के शिव मंदिर की शिखा पर लगे त्रिशूल की दिशा बदल जाती है. इसे देखने के लिए कई लोगों ने कोशिश की लेकिन असमर्थ रहे. रात को त्रिशूल की दिशा एक तरफ रहती है लेकिन सुबह होने तक दिशा बदल जाती है.

त्रिशूल की दिशा बदलना इस मंदिर की महिमा है, जो लोगों को दूर-दूर से अपनी ओर आकर्षित करती है. जी हां, यह विशेषता है यमुनापार में स्थित सोमेश्‍वरनाथ मंदिर की. महाशिवरात्रि 21 फरवरी को है. वहीं शहर और ग्रामीण अंचल में शिवरात्रि की तैयारी जोरों पर है. इसी में से एक प्राचीन, पौराणिक और आस्था के साथ विश्वास का केंद्र यमुना पार में अरैल गंगा तट पर स्थित सोमेश्वर नाथ मंदिर है. यही ऐसे शिवालय हैं जहां महाशिवरात्रि पर निशान के रूप में ध्वज लेकर लोग दूर-दूर से नाचते गाते हुए आते हैं. यहां शिवलिंग में भक्त शिवजी के मानों साक्षात दर्शन पाते हों.

तीर्थराज प्रयाग के अरैल नैनी में सोमेश्वर महादेव मंदिर अनादिकाल से और काफी सिद्ध शिवालय है. पौराणिक गाथा है कि इसकी स्थापना स्वयं चंद्र देव ने क्षयरोग के श्राप से मुक्त होने के लिए की थी. शिवलिंग की स्थापना कर चंद्र देव ने भगवान शिव की घोर तपस्या की. भगवान शिव जब प्रगट हुए तो उनके वरदान से चंद्र देव राजा दक्ष के श्राप से मुक्त हुए थे. पुराणों में उल्लिखित है कि राजा दक्ष की 60 बेटियां थी। सभी का चंद्र देव से विवाह हुआ था. चंद्र देव राजा दक्ष की सबसे छोटी बेटी रोहणी पर मोहित हो गए. वे उसके अलावा अन्य को समय नहीं देते थे, जिससे दक्ष की अन्य बेटियां काफी व्यथित हो गई. वे जब मायके गईं तो मां ने उसका कारण पूछा. बेटियों ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया. इसकी जानकारी राजा दक्ष को हुई तो वे क्रोधित हो गए. उन्होंने चंद्र देव को क्षयरोग से ग्रसित होने का श्राप दे दिया. श्राप से चंद्र देव घबरा गया.

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श्राप से मुक्त करने के लिए अन्य देवताओं ने राजा दक्ष से गुहार लगाई. राजा दक्ष ने कहा कि चंद्र देव प्रयागराज में शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की तपस्या करेंगे, तो श्राप से मुक्ति मिल सकती है. चंद्र देव तपस्या की, तब भगवान शिव प्रसन्न हुए थे.

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