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प्राचीन भाषा संस्कृत का जन्म कब और कैसे हुआ था? 2 Sanskrit literature

प्राचीन भाषा संस्कृत का जन्म कब और कैसे हुआ था?

संस्कृत को सबसे प्राचीन भाषा मानी गयी है। यह तक की कुछ जगह यह भी कहा गया है कि हिंदी का जन्म संस्कृत भाषा के अपभ्रंश से हुआ है।  हालाँकि इसमें कोई सत्यता नहीं है, लेकिन संस्कृत का जन्म कैसे हुआ यह बहुत ही कम लोग जानते हैं। क्योंकि संस्कृत साहित्य पहला श्लोक रामायण का भी पहला श्लोक बना जिसके कारण रामायण ही संस्कृत साहित्य का पहला महाकाव्य बना। आज हम आपको बताएँगे की संस्कृत भाषा का जन्म कैसे और कब हुआ।

संस्कृत भाषा का उदय उसके पहले श्लोक मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम् ॥ के साथ हुआ। इस श्लोक की रचना वल्मिकि ऋषि ने की थी, इसके पीछे एक रोचक कहानी है। तो आइए पहले उस कहानी को पढ़ते हैं।

वाल्मीकि ऋषि एक दिन ब्रह्ममूहूर्त में स्नान, नित्य कर्मादि के लिए गंगा नदी की तरफ जा रहे थे। ऋषि का वस्त्र उनके साथ चल रहे शिष्य भारद्वाज मुनि लिए हुए थे। चलते- चलते रास्ते में ही उन्हें तमसा नामक एक नदी मिली जिसका जल शुद्ध और निर्मल था, यह देखकर ऋषि रुक गए और भारद्वाज मुनि से बोले – किसी निष्पाप मनुष्य का मन जैसा इस नदी का जल स्वच्छ है। आज मैं यही स्नान करूँगा। उसके बाद ऋषि धारा में प्रवेश करने के लिए उपयुक्त स्थान ढूंढ रहे रहे थे तभी उन्होंने प्रणय-क्रिया में लीन क्रौंच पक्षी के जोड़े को देखा।

पक्षी युगल को देखकर उन्हें भी हर्ष हुआ, लेकिन तभी अचानक से एक उड़ता हुआ बाण कहीं से आता है और नर पक्षी को लग जाता है। नर पक्षी चीत्कार करते, तड़पते हुए वृक्ष से गिर जाता है जिसके बाद मादा पक्षी इस शोक से व्याकुल होकर विलाप करने लगती है।

यह दृश्य देखकर ऋषि व्यतिथ हो जाते हैं। कुछ देर बाद उसी स्थान पर एक बहेलिया दौड़ता हुआ आता है। जिसने नर पक्षी पर बाण चलाया होता है उसे देखकर ऋषि के मुख से अनायास ही बहेलिये के लिए श्राप निकल जाता है। वही श्राप संस्कृत भाषा का पहला श्लोक बनता है। ऋषि द्वारा दिया गया यह श्राप इस प्रकार है :-

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम् ॥

अर्थ : हे निषाद ! तुमको अनंत काल तक (प्रतिष्ठा) शांति न मिले, क्योंकि तुमने प्रेम, प्रणय-क्रिया में लीन असावधान क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक की हत्या कर दी है।

श्राप देने के पश्चात ऋषि इस बात पर विचारमग्न हो गये की यह छन्दबद्ध वाक्य उनके मुख से क्यों निकला। यह बात उन्होंने अपने शिष्य भारद्वाज मुनि को बताई। वाल्मीकि ऋषि ने कहा कि आज मेरे मुख से यह इतना छन्दबद्ध वाक्य क्यों निकला, यह मुझे समझ नहीं आ रहा है। क्योंकि यह वाक्य 8 अक्षरों के 4 चरण से मिलकर बना है। आज मैं इस छन्दबद्ध वाक्य को श्लोक का नाम देता हूँ। श्लोक की उत्पत्ति तो किसी काव्य रचना का आधार होना चाहिए, पर मेरे पास लिखने को तो कोई विषय ही नहीं है।

स्नान के पश्चात ऋषि विचार मंथन करते हुए अपने आश्रम की ओर लौट आये। आने के पश्चात वह ध्यानमुद्रा में बैठे तो भगवान ब्रह्मा ने दर्शन दिये।भगवान में नारद मुनि द्वारा सुनाई गयी राम कथा का स्मरण कराया। भगवान ने वाल्मीकि ऋषि को प्रेरित करते हुए आशीर्वाद दिया और कहा कि वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कथा श्लोक द्वारा रचकर एक काव्य का निर्माण करें। इस प्रकार वाल्मीकि ऋषि द्वारा संस्कृत के पहले श्लोक की उत्पत्ति हुई जिसके बाद रामायण महाकाव्य का निर्माण भी संभव हुआ।

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