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“जहां चाह, वहां राह” ये पंक्तियां एक बार फिर सच साबित हुई हैं…

इलाहाबाद शहर की मलीन बस्तियों में घोर गरीबी व अभाव में पली-बढ़ी चार बच्चियों भारती, विशाखा, रोशनी और प्रीती ने इस वर्ष इलाहाबाद विश्वविद्यालय के यूजीएटी की प्रवेश परीक्षा पास कर दिखाया है।

अजय सिंह/प्रयागराज। कहा गया है, “जहां चाह, वहां राह”! ये पंक्तियां एक बार फिर सच साबित हुई हैं… आज के समय में हर अभिभावक का सपना होता है कि वो अपने बच्चों का बेहतर से बेहतर स्कूल में दाख़िला कराए। इसके लिए वो खुशी-खुशी, भारी-भरकम फीस भी अदा करते हैं। अभिभावकों द्वारा बच्चे की पढ़ाई के नाम पर आसानी से पैसे ख़र्च करने के चलते आज शिक्षा एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है।

आलम यह है कि बच्चे को एल.केजी. में दाख़िला कराते ही, अभिभावकों के सिर पर भारी-भरकम ख़र्च का बोझ लद जाता है। इसीलिए आज भी समाज का एक तबका है, जिनके बच्चे पैसों की तंगी के चलते महंगे स्कूलों में नहीं जा पाते।

आज के सरकारी स्कूलों की दशा किसी से छिपी नहीं है। जबकि प्राइवेट कॉन्वेन्ट्स की फीस इतनी अधिक है कि वहां पढ़ा पाना सबके वश की बात नहीं है। यही कारण है कि पैसों की तंगी के कारण हर साल, जाने कितने बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। या फिर वो छोटे-मोटे स्कूलों में पढ़ाई की खानापूर्ति करने तक ही सीमित रह जाते हैं। जिसके कारण धीरे-धीरे वो हीन भावना का शिकार होकर रह जाते हैं।

वहीं दूसरी ओर, अच्छे विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए कठिन प्रवेश परीक्षा से गुजरना होता है। इस वजह से छोटे स्कूलों में पढ़े बच्चों के मन में कई तरह की भ्रांतियां बन जाती हैं। उन्हें लगता है कि अच्छे कॉन्वेंट स्कूलों/कॉलेजों में पढ़े-लिखे संपन्न घरों के बच्चे, हम जैसे छोटे स्कूलों या पैसे के अभाव में पढ़े बच्चों को पछाड़ देते हैं।

लेकिन इस बार यह मिथक भ्रांति बुरी तरह टूट गई है। इलाहाबाद शहर की मलीन बस्तियों में घोर गरीबी व अभाव में पली-बढ़ी चार बच्चियों भारती, विशाखा, रोशनी और प्रीती ने इस वर्ष इलाहाबाद विश्वविद्यालय के यूजीएटी की प्रवेश परीक्षा पास कर दिखाया है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित स्नातक प्रवेश परीक्षा में भारती ने 136 अंक, विशाखा ने 128 अंक, रोशनी ने 126 अंक और प्रीती ने 122 अंक प्राप्त किए हैं। ये अंक इन चारों बच्चियों को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मेन कैंपस में दाख़िला दिलाने को पर्याप्त हैं।

ये बच्चियां इलाहाबाद शहर के यमुना तट से सटे कीडगंज क्षेत्र से हैं। बच्चियों का जीवन कितने अभाव में बीता है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इन्हें पीने के लिए पानी तक 200 मीटर दूर से ढोना पड़ता है।

मलीन बस्तियों की इस प्रतिभा को निखारने का काम शहर के ही ईविंग क्रिश्चियन कॉलेज (ईसीसी) के छात्रों द्वारा चलाया जा रहा है। छात्रों के इस प्लैटफॉर्म का नाम ‘एक पहल शिक्षा समिति’ (पहल) है। ‘पहल’ ने कूड़ा बीन रहे, भीख मांग रहे बच्चों को सड़क से उठाकर पढ़ाना, लिखाना शुरू किया।

इस समय एक पहल शिक्षा समिति (पहल) करीब 200 ऐसे छात्र-छात्राओं के जीवन स्तर को संवारने में लगी है। पहल द्वारा बच्चों को स्कूलों में दाखिला करवाने से लेकर उन्हे ट्यूशन देने तक का काम किया जाता है।

बच्चियों की इस सफलता से न सिर्फ ‘एक पहल शिक्षा समिति’ से नि:स्वार्थ रूप से जुड़े युवाओं का हौसला बढ़ा है, बल्कि इससे मलीन बस्तियों में रहने वाले बच्चों समेत अभिभावकों में भी आशा की एक लौ जली है। उनमें आस जगी है कि वो और उनके बच्चे भी कुछ कर सकते हैं।

जाहिर सी बात है, इन बच्चियों ने इतने अंक प्राप्त करके महंगे कॉन्वेंट स्कूलों में पले-बढ़े जाने कितने छात्र-छात्राओं को पछाड़ा होगा। इन बच्चियों की यह सफलता छोटी सी किंतु अभूतपूर्व व अप्रत्याशित है। नि:संदेह आप कह सकते हैं कि विश्वविद्यालयों में तो हर साल हजारों बच्चे प्रवेश पाते हैं। इसमें इतनी बड़ी बात क्या है! लेकिन भारती, विशाखा, रोशनी और प्रीती की यह सफलता औरों से थोड़ी नहीं बल्कि बहुत अलग है।

ये वो बच्चियां हैं, जिन्हें मां के गर्भ से लेकर आजतक उचित पौष्टिक भोजन नहीं मिला। ये वो बच्चियां हैं, जो 200 मीटर दूर से पानी भरकर घर लाती हैं। ये वो बच्चियां हैं, जिनके यहां घर के नाम पर पन्नी से घेरा हुआ ‘खानाबदोशी डेरा’ है। ये वो बच्चियां हैं, जिनके लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना किसी स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड या कैब्रिज में प्रवेश पाने से कम नहीं है!

चारों बच्चियों का यह रिजल्ट एक संदेश है। यह एक संदेश है कि अगर बच्चों में पढ़ने का जुनून हो और उन्हें सही मार्गदर्शन मिले तो अभावों में पले-बढ़े बच्चे भी देश के जाने-माने ‘विश्व-विद्यालयों’ में दाखिला पा सकते हैं। इसके अलावा यह आधूनिक अभिभावकों के लिए भी एक संदेश की तरह है।

यह बताता है कि बचपन से ही अपने प्यारे बच्चों को महंगी फीस और बस्तों के बोझ तले दबाकर, किसी कथित नामी स्कूलों में भेजना कोई बड़ी बात नहीं है। अभिभावकों को यह समझना होगा कि बचपन में ही अपने बच्चों को महंगी स्कूलों में महंगी-महंगी किताबों के बोझ तले दबाकर वो अपने बच्चों को निखार नहीं रहे हैं, बल्कि उनकी अंकुरित होती प्रतिभा को कुचल रहे हैं। इस प्रतिभा को कुचलने के लिए वो मेहनत और खून-पसीने से कमाया अपना पैसा किसी धनपशु व्यवसायी स्कूल के मालिक की जेब में खुशी-खुशी भेज रहे हैं।

इन बच्चियों की यह सफलता केवल उनकी सफलता भर नहीं है। यह हर अभिभावकों के लिए एक संदेश है। यह व्यवसाय के उद्देश्य से देशभर में खुले अनगिनत महंगे स्कूलों की ‘मान्यताओं’ की हार है। यह अभावों में पल-बढ़ रहे देश के हर मेहनती छात्र-छात्राओं की सफलता है…

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