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शहीद भगत सिंह के शव को दो बार दी गई मुखाग्नि, यह है वजह

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेजों द्वारा फांसी पर लटका दिया गया था. देश के इन सपूतों के सम्मान में प्रतिवर्ष इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है.

देहरादूनः (Dehradun)। ब्रिटिश राज में आज से 86 साल पहले 23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेजों द्वारा फांसी पर लटका दिया गया था. देश के इन सपूतों के सम्मान में प्रतिवर्ष इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. लेकिन अंग्रेजों द्वारा इन तीनों को सजाए मौत देने के बाद भी उनपर अत्याचार जारी रहे हैं. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटकाने के बाद इन तीनों के शवों को दो बार जलाया गया. आइए आपको बताते हैं इसके पीछे की वजह जिसे जानकार हर हिंदूस्तानी का खून खौल जाएगा.

तय दिन से पहले फांसी पर लटकाया

यह बात बहुत ही कम लोग जानते होंगे की भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लेकर ब्रिटिश सरकार बेहद खौफजदा थी. जिस कारण अंग्रेजों ने तय दिन से एक दिन पहले ही बिना किसी को बताए तीनों को फांसी पर लटका दिया था. लोगों को इसकी भनक ना लग सके इसके लिए अंग्रेज सरकार ने तीनों के शवों के टुकड़े-टुकड़े कर सतलुज नदी के किनारे हुसैनी बाला के नजदीक आग के हवाले कर दिए. दरअसल ब्रिटिश सरकार को डर था कि एक दिन पहले इन क्रांतिकारियों को फांसी देने से बगावत बढ़ सकती है.जिसके डर से अंग्रेजों ने गुपचुप तरीके से इनके शवों को आग के हवाले करने की योजना बनाई.

लेकिन इस बात की भनक देशवासियों को लग गई. अपने शहीद बेटों के शवों का अपमान की खबर मिलते ही हजारों की संख्या में लोग वहां इकट्ठा होने शुरु हो गए. जिस जगह पर इन तीनों शहीदों के शवों को ब्रिटिश सरकार द्वारा गुपचुप तरीके से जलाया जा रहा था. इतिहासकारों की मानें तो इस भीड़ में लाला लाजपात राय की बेटी पार्वती, भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर समेत परिवार के अन्य लोग भी शामिल थे.

भाग खड़ें हुए अंग्रेज

आक्रोशित भीड़ को देखकर अंग्रेज वहां से उनके शवों को अध-जला छोड़ वहां से भाग खड़े हुए. जिसके बाद लोगों ने इन वीर बेटों के शवों को जलती हुई आग से बाहर निकाला. जिसके बाद परिवार के लोगों इन तीनों के शवों के लिए तीन अर्थियां बनाकर उन्हें लाहौर में रावी नदी के किनारे ले जाकर पूरे सम्मान के साथ उनका देह संस्कार किया. भगत सिंह की चिता को दो बार अग्नि दी गई इस बात की पुष्टि सुखदेव के भाई मथुरा दास की एक किताब ‘मेरे भाई सुखदेव’ में भी मिलता है.

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