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‘अच्युतानंद महाराज कब्रिस्तान’ जहां हिंदुओं को जलाया नहीं दफनाया जाता है, जानें क्यों और कैसे हुई शुरुआत

भारत में ही एक ऐसा शहर भी मौजूद है जहां पर हिंदुओं को मृत्यु के बाद जलाया नहीं बल्कि उन्हें जमीन में दफनाया जाता है. यह जानकर हो सकता है आपको कुछ अटपटा सा लगा लेकिन यह सत्य है. दरअसल उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में बीते 90 सालों से हिंदुओं को कब्रिस्तान में दफनाया जा रहा है.

बरेलीः (Bareilly)। हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार करने से उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसलिए हिंदू समाज में व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसको पूरे रीति-रिवाज के साथ अग्नि के सुपुर्त कर दिया जाता है. लेकिन भारत में ही एक ऐसा शहर भी मौजूद है जहां पर हिंदुओं को मृत्यु के बाद जलाया नहीं बल्कि उन्हें जमीन में दफनाया जाता है.

यह जानकर हो सकता है आपको कुछ अटपटा सा लगा लेकिन यह सत्य है. दरअसल उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में बीते 90 सालों से हिंदुओं को कब्रिस्तान में दफनाया जा रहा है. आखिर हिंदू रिती-रिवाज के विपरीत ऐसा क्यों किया जा रहा है और इसके पीछे की क्या वजह है, आइए इसके बारे में हम आपको बताते हैं.

दलित बच्चे की मौत से शुरु हुई कहानी

जिस हिंदू कब्रिस्तान के बारे में हम आपको बता रहे हैं उसका निर्माण ब्रिटिश काल में साल 1930 में हुआ था. आपको जानकर हैरानी होगी कि इसकी शुरुआत भी अंग्रेजों ने की थी. वर्तमान में यह कब्रिस्तान कानपुर शहर के कोकोकोला चौराहा रेलवे क्रॉसिंग के बगल में है जिसे ‘अच्युतानंद महाराज कब्रिस्तान’ के नाम से जाना जाता है.

आपको बता दें कि स्वामी अच्युतानंद महाराज दलित वर्ग के हितों के पक्षधर थे. साल 1930 में कानपुर प्रवास के दौरान वह एक दलित वर्ग के बच्चे के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भैरव घाट गए थे. लेकिन वहां मौजूद पण्डे ने दलित बच्चे का अंतिम संस्कार करने के एवज में मोटी दक्षिणा का मांग की. जिसे देने में दलित के परिजन असर्मथ थे. यह देखकर स्वामी अच्युतानंद को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने पण्डों से इस बात लेकर उनका विरोध भी किया. जिससे नाराज पाण्डों ने बच्चे का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया.

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स्वामी अच्युतानंद को पण्डों की इस बात पर बहुत गुस्सा आया और उन्होंने स्वयं ही पूरे रीति-रिवाज के साथ बच्चे का अंतिम संस्कार किया. लेकिन स्वामी अच्युतानंद दलितों की हालात को देखते हुए शहर में ही दलित बच्चों के लिए कब्रिस्तान बनाने की ठानी. इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों से जमीन की मांग की और अंग्रेजों ने उन्हें जमीन दे भी दी. जिसके बाद से स्वामी अच्युतानंद ने द्वारा बनाए गए इस कब्रिस्तान में हिंदुओं का दफनाया जा रहा है. बता दें कि साल 1932 में स्वामी अच्युतानंद की मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर को भी इसी कब्रिस्तान में दफनाया गया था.

हर उम्र का शव दफनाया जाता

इस हिंदू कब्रिस्तान की शुरुआत दलितों के बच्चों को मौत के बाद यहां दफनाने के लिए हुई थी. लेकिन बदलते समय के साथ अब यहां पर किसी भी जाति के शव दफनाया जा सकता है. अब यह कब्रिस्तान बच्चों तक ही सीमित नहीं रह गया है. इसमें अब हर उम्र और जाति के लोगों का शव दफनाया जाता है.

90 साल से मुस्लिम परिवार कर रहा देखरेख

आपको जानकर हैरानी होगी कि हिंदुओ के इस कब्रिस्तान की देखरेख बीते 90 सालों से एक मुस्लिम पीर मोहम्मद शाह परिवार के द्वारा की जा रही है. पीर मोहम्मद ने 12 वर्ष की आयु से कब्रिस्तान की देखरेख का काम करना शुरु किया था. उनका काम यहां आने वाले शवों को दफनाना और कब्रों की देखरेख करना है.

पीर मोहम्मद का दावा है कि इस कब्रिस्तान में केवल हिंदुओं के शव दफनाने के लिए लाए जाते हैं. यहां पर मुसलमानों के शव नहीं दफनाए जाते. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार करने के लिए पंडित नहीं आते. बल्कि मुस्लमान ही यहां पर अंतिम संस्कार करवाते हैं.

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