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!! लुड़की – लुड़की, उड़ती – उड़ती !!

hum log

“भाई लुड़की – लुड़की गेंद दीयों  तब खेलूंगी बेटबॉल, हवा में उड़ती – उड़ती गेंद नहीं दियो उसपर मेरा बल्ला नहीं लगता ” “हां ठीक है मैं लुड़की – लुड़की गेंद दूंगा चल खेल मेरे साथ” हम थोड़ी देर खेलते मैं उसे हवा में फेंककर बोल देती वो खूब जोरदार बल्लेबाजी करता दूर- दूर गेंद पंहुचाता, मैं धीरे-धीरे जाकर लाती थक जाती कभी-कभी हवा में खूब ऊपर उड़ाता मैं केच भी नहीं कर पाती, जल्दी से वो आउट भी नहीं होता था, जब मेरी बारी आती बेटिंग की तो मैं फिर से दोहराती  भाई मैं हवा में उड़ती गेंद पर बल्ला नहीं मार पाउंगी, लुड़की – लुड़की गेंद दे” वो कहता “अरे कैसी लड़की है भला ऐसे भी कोई खेलता है देखा है किसी को, छोटे-छोटे चार साल के बच्चे खेलते हैं लुड़की – लुड़की गेंद से, तू मेरी बहन है कैसे नहीं खेलेगी उड़ती गेंद से चल में आराम से फेंकता हूँ ध्यान से गेंद को देख और उसपर बेट घुमा कर मार डर मत”  मैं कहती “नहीं – नहीं जहाँगीर भाई गेंद मेरे मुँह पर लग जाएगी मैं नहीं तू लुड़की – लुड़की गेंद फेंक” फिर वो बेचारा मज़बूर होकर नीचे ज़मीन पर गेंद लुड़का कर देता और हंसता रहता मैं खेलती, फिर वो बोर होकर या शरारत के तौर पर अचानक गेंद ऊपर हवा में उछाल कर फेंक देता जो पिछे ईंट की बनाई किल्लीयों में जाकर घूस जाती, और वो चिल्ला देता “आउट हो गई आउट हो गई चल अब मुझे बॉलिंग करा” मैं ख़फ़ा होकर कहती “तूने जानबूझकर आउट किया है, क्यों दी गेंद फेंककर जा मैं नहीं खेलती” और दूर जाकर मुँह पर हाथ रखकर बैठ जाती रोने भी लग जाती वो खूब मनाता चल बहन नी है अब नी करूंगा चल मुझे बैटिंग करा। 

स्कूल में जिस दिन ड्राईंग का पेपर होता क्लास में सब मज़े – मज़े से ड्राईंग बनाते सीनरी वगैरह – वगैरह मुझे ड्राईंग बनाने का बहुत शोंक़ था पर मेरे भाई जहाँगीर को ज़रा भी शोंक़ नहीं,  उसे झंडा सेब आम के सिवा कुछ बनाना नहीं आता था, ड्राईंग का पेपर उसके लिए मुसीबत होता था और इम्तिहान से एक रोज पहले मेरे से कहना शुरू कर देता “बहन कल अपनी ड्राईंग जल्दी – जल्दी बनाकर मेरी भी बना दियो, तू बस बना दियो किसी तरह रंग में भर लूंगा” मैं कह देती “नहीं तू मुझे लुड़की – लुड़की गेंद देता है? लूडो केरमबॉट में भी चालाकी से मुझे हराता है मेरी गोट इधर-उधर करता है” वो कहता “अच्छा अब लुड़की – लुड़की गेंद दूंगा बहन नी है” मैं कहती “पक्का अब से….” और फिर इम्तिहान में मैं अपनी ड्राईंग बनाकर उससे कहती – कहती  उसकी ड्राईंग बनाती “देख झूट मत बोलियो, अगर लुड़की गेंद नहीं दी न तो मैं कभी तेरी ड्राईंग नहीं बनाउंगी” वो कहता “हां बहन नी है तू जल्दी- जल्दी से बना मैं लुड़की – लुड़की गेंद दूंगा। 

यह लुड़की – लुड़की उड़ती – उड़ती गेंद, साथ-साथ बेटबॉल खेलने, ड्राईंग बनाने का रूठने मनाने का सिलसिला आठवीं कक्षा तक चला, उसके बाद वो  दूसरे स्कूल में गया शाम की शिफ्ट में और मैं दूसरे स्कूल में सुबह की शिफ्ट में जब मैं स्कूल होती तो वह ट्यूशन जाता और जब वो स्कूल जाता तो मैं ट्यूशन दिनभर हम मिल नहीं पाते, रात को मैं खाना बनाती फिर सबको खिलकर स्कूल का काम करती, वो छोटे कमरे में सोता अम्मी अब्बा और मैं बड़े कमरे में, गर्मी में रात को छतपर सब एक साथ सोते थे, वह बड़े मज़े के दिन होते थे, बिस्तर चटाई दोनों बहन – भाई लड़ – लड़ कर ले जाते थे वो बिस्तर लाने लेजाने में आना – कानी करता था “मैं क्यों ले जाऊं ये लड़कियों का काम है तू ले जा” जब मैं रोती तो मदद करता था, जब भाई बारहवीं में था तो अम्मी का एक फेफड़ा ख़राब हो गया तम्बाकू का पान खाने से तब तीन महीने अस्पताल में भर्ती रही, अब्बा अस्पताल में अम्मी के साथ रहते थे मैं घर पर बीए फर्स्ट ईयर के इम्तिहान दे रही थी इम्तिहान के लिए थोड़ा वक़्त निकाल कर पढ़ती खाना बनाती साफ-सफाई करती दुकान पर भी बैठती, और भाई दुकान खोलता बंद करवाता दिन में बैठता भी था, सुबह – शाम अम्मी अब्बा के पास खाना लेकर जाता, उसके बाद जब अम्मी घर आई तो हमेशा भाई छत पर अम्मी को गोद में उठाकर ले जाता निचे लाता फिर उसके एक साल बाद अम्मी को फालिज़ मार गई उसके बाद अम्मी पूरी तरह से मोहताज़ हो गई, भाई ही हर जगह उठा – उठा कर ले जाता और कभी-कभी अब्बा उठाते थे, मैं और भाई मिलकर अम्मी को नहलाते कपड़े पहनाते कभी- कभी अब्बा भी नहलाने में साथ देते अम्मी की देखभाल हम दोनों ने साथ-साथ मिलकर की यही काम ऐसा था जिसमें भाई और मैं आपस में झगड़ा नहीं करते थे, मैं छतपर बिस्तर अकेली ले जाने लगी क्योंकि भाई अम्मी को उठाकर ले जाता था वो बिस्तर लाने ले जाने से ज़्यादा मुश्किल काम था। अम्मी को नहलाकर कभी- कभी सुर्मा लगा देते थे अम्मी की आँखें बहुत ख़ूबसूरत थी उसकी आँखों का डीमा सुरमई रंग का था बड़ी-बड़ी पलकें, बड़ी-बड़ी आँखें, जब मैं सुबह उठती तो उठते ही अम्मी को देखकर कहती “अम्मी” तो अम्मी बिना मुँह से बोले अपनी आँखों की पलकें हिलाकर इशारे में अभिव्यक्त करती, कभी कह भी देती पलकें हिलाकर “बाबू” भाई आठवीं कक्षा के बाद कल्हड़ एफरो में एतवार के दिन क्रिकेट खेला करता था और मैं ड्राईंग बनाया करती थी अब्बा भाई को क्रिकेट खेलने के लिए डाँटा करते थे और अम्मी मुझे ड्राईंग बनाने के लिए। मैंने छोड़ दिया था बनाना, मगर भाई से सब्र नहीं होता था वो चुपके-चुपके जाता था खेलने और खेलने के चक्कर में कई बार अब्बा से मार खाई मगर छोड़ा नहीं, पर जब अम्मी बारहवीं कक्षा के बाद बहुत बीमार रहने लगी उन्हें उठाकर घर में इधर-उधर ले जाने का काम भाई पर आया तो उसने क्रिकेट खेलना छोड़ दिया। धीरे-धीरे हमारी बढ़ती उम्र में इन सब जिम्मेदारियों में हालात में बचपन पिछे छूटता गया खेल भी लड़ना झगड़ना भी मेरा और भाई का वक़्त भी एक-दूसरे के साथ कम ही गुज़रता।

हम हर काम में लड़ते हैं झगड़ते हैं खाने-पीने में खेलने में साइकिल चलाने में, सफर में खिड़की वाली सीट के लिए, बेड पर किनारे में सोने के लिए, मोटे-मोटे रस फेन आम के लिए, आज भी कभी-कभी झगड़ पड़ते हैं कभी-कभी नाइत्तिफ़ाक़ी के कारण, मगर जब कभी भी अम्मी का इलाज देखरेख नहलाना खिलाना हुआ करता था तो कभी नहीं झगड़े हर मुश्किल को साथ मिलकर पार किया, और अब अम्मी नहीं है दस साल हुए उनके इंतक़ाल को, अब अब्बा को बीमार होने पर देखते हैं साथ-साथ अब भाभी भी साथ देती है अब्बा का ख़्याल रखती है इस काम में, अम्मी – अब्बा की देखभाल केयर करने में हम दोनों बहन भाई की केमिस्ट्री बहुत अच्छी रही हमेशा। 
कितना पाक़ रिश्ता बनाया अल्लाह ने भाई – बहन का चुलबुला भी दोस्ती का भी, यही रिश्ता ख़ून का होता है। जब माँ-बाप दुनिया में नहीं होते तब भाई – बहन ही एक दूसरे के लिए माँ-बाप की बची वाहिद निशानी होते हैं। बचपन की एक-दूसरे के साथ की छेड़छाड़ लड़ाई-झगड़े बचकाना हरकतें शरारतें कभी भुलाई नहीं जा सकती। मगर वक़्त जैसे – जैसे आगे बढ़ता है वैसे- वैसे भाई – बहन की सोच में वातावरण माहौल परवरिश तर्बियत के मुताबिक बदलाव आता रहता है और जब यह रिश्ता यंग ऐज़ पर आता है तो बहन में औरतपन और भाई में आदमीपन आने लगता है दिल की जगह दिमाग़ काम करने लगता है। 

मुहब्बत तो रहती है मगर वो मिठास नहीं रहती, जिसका कारण है भाई पुरष बन जाता है पुरुषवादी मानसिकता के लक्षण धीरे-धीरे दिल दिमाग़ पर हावी होने लगते हैं। मुहब्बत तो होती है बहन से अगर कोई उसकी बहन की तरफ़ ग़ैर लड़का आँख उठाकर देख ले छेड़ दे तो उसकी हड्डी पसली तोड़ देता है, मगर उस वक़्त भूल जाता है बहन की इज्ज़त जब किसी दूसरे की बहन को छोड़ता है हवस की निगाह से देखता है तब नहीं सोचता कि यह भी किसी की बहन है। खुद अपनी लव मैरिज कर लेगा पुरे समाज माँ-बाप खानदान से रौशनख़्याल की लम्बी चौड़ी बहस करके, मगर बर्दाश्त नहीं कि बहन भी किसी से मुहब्बत कर ले अपना शरीक़ेहयात ख़ुद चुन ले, उसपर अकेली पर समाज खानदान की इज्ज़त का बोझ डाल देता है, भाई अपनी बहन की शादी में लाखों का सामान देते हैं, धूमधाम से बहन की शादी करने का संपना हर भाई का होता है, बहन की शादी अच्छी तरह से हो चाहे क़र्ज़ ही क्यों न कर लें बिचारे, मगर पिता की संपत्ति में से उसका हक़ देने के लिए राज़ी नहीं होता कभी, जो बहन अपना हक़ मांग ले वो दुनिया की सबसे बुरी बहन घर में आना – जाना भी बंद कर दिया जाता है। मर्द पढ़ लिखकर भी पुरुषवादी मानसिकता के दकियानूसी हैं। 

ऐसे ही बहन भी बड़ी होकर औरतपन दिखाती है, भाई की मुहब्बत तो होती है, मगर भाई की शादी के बाद उसकी पत्नी के साथ ननद बनकर किस तरह का रोल अदा करती हैं जग जाहिर है। यह ननद- भाभी सास – बहू का रिश्ता बहुत ख़राब बना दिया औरतों ने अपने किरदार से, बहुत ख़ुदग़र्ज़ रिश्ते हैं ये, औरत न पत्नी के रूप में चाहती है कि उसका पति अपनी माँ बहन को प्यार करे कुछ ले दे उन्हें उसे उनके साथ शेयर नहीं करना चाहती, और न सास बनकर चाहती है कि उसका बेटा अपनी पत्नी के साथ मिलजुल कर रहे उसे पैसा ख़र्च ठीक से दे वो बेटे को बहू के साथ शेयर नहीं करना चाहती, और न बहन चाहती है कि उसका भाई उसकी भाभी को अच्छी तरह से रखे मुहब्बत करे, वो भाई को भाभी के साथ शेयर नहीं करना चाहती, माँ चाहती है बेटा सिर्फ मेरा बनकर रहे, बहन चाहती है कि भाई सिर्फ मेरा बनकर रहे, पत्नी चाहती है पति सिर्फ़ मेरा बनकर रहे, और इन सब रिश्तों के बीच बिचारे भाई बेटे पति के रूप में मर्द पीसकर रह जाता है। औरतें पढ़ लिखकर भी दक़ियानूसी रूढ़िवादी मानसिकता की हैं ख़ुदग़र्ज़। 

बड़े होकर दुनियादारी में फंसकर शादी के बंधन में बंध कर वो प्यारा सा भाई – बहन का रिश्ता जब सास बहू ननद भाभी देवरानी-जेठानी में तब्दील होता है कहाँ खो जाती है वो मासूमियत चुलबुला पन वो दोस्ती मिलजुल कर खेलना खाना। बचपन के लड़ाई-झगड़े में मुहब्बत छुपी होती है, बड़े होने पर वही लड़ाई-झगड़ा नफरत हसद आदमीपन औरतपन की बुनियाद पर होता है। 
काश कि भाई बड़े होकर बहन को ढेर सारा दहेज़ देने के बजाय उसके ख़ुदमुख़्तार बनाने में पैसा खर्च करें, और उसे उसका हमसफर खुद चुनने में मदद करें उसे उसका हक़ दें दहेज़ नहीं। और बहने भी खलनायिका बनकर भाई भाभी में झगड़ा न करवाएं, भाई भाभी की शादीशुदा ज़िंदगी की गाड़ी को ठीक रास्ते पर पटरी पर चलने दें, भाई को भड़का फुसलाकर भाभी के खिलाफ न करें। यह रब का बनाया ख़ूबसूरत भाई – बहन का रिश्ता सिर्फ बचपन में नहीं बल्कि मरने के वक़्त तक ख़ूबसूरत रहने दें।

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