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‘वैलेंटाइन’ नहीं ‘कोरन्टाइन’

दुनिया में जब कभी विसंगतियों का इतिहास लिखा जाएगा तब सामाजिक दूरियों का जिक्र सबसे पहले किया जाएगा। विज्ञान के जरिये जिस नेटवर्किंग के सहारे दुनिया सिकुड़ कर मुट्ठी में आयी थी उसी नेटवर्किंग को तिलांजलि देकर आज दुनिया को दूरियों की तरफ बढ़ना पड़ रहा है। और इसका कारण बना है एक अदृश्य विषाणु, जो फिलवक्त आत्मा की तरह अजर-अमर है। “नैनं छिदन्ति शस्त्राणि!”

इस धरती पर सामजिक निकटता की लिए समाज की संकल्पना के साथ ही निकटता को महत्व दिया गया है। दूरियां समाज ने कभी स्वीकार नहीं कीं। दुनिया भले ही गोल हो लेकिन दुनिया का हर कोना एक-दूसरे से जुड़ा रहना चाहता है, जुड़ा हुआ भी है। सामाजिक जुड़ाव के साथ आर्थिक और अन्यान्य कारण इसके पीछे रहे हैं, किन्तु आज समय आ गया है जब जीवन बचने के लिए ‘एकांत’ को प्रतोत्साहित किया जा रहा है। अब एकांत ही जीवन की सुरक्षा की गारंटी बन गया है।

कोई छब्बीस साल पहले तक दुनिया एक-दूसरे से जल,थल और नभ यात्राओं के जरिये ही आपस में जुड़ी थी। किन्तु 1994 में इंटरनेट ने दुनिया को एक ऐसी आभासी दुनिया में ला खड़ा किया जहां दूरियां लगभग समाप्त ही हो गयीं। इंटरनेट की प्रगति के साथ ही सोशल नेटवर्किंग ने भी रफ्तार पकड़ी। आज न जाने कितने लोकप्रिय सोशल प्लेटफार्म हैं जो समाज के साथ दुनिया की सियासत को रिफार्म कर रहे हैं। पर अचानक जन्में एक विषाणु ‘कोरोना’ ने दुनिया को एक बार फिर अलग-अलग इकाइयों में बंटने के लिए विवश कर दिया।

दुनिया अब ‘ वैलेंटाइन’ नहीं बल्कि ‘कोरन्टाइन’ की ओर जा रही है। अदृश्य विषाणु से निबटने के लिए दुनिया के हाथ में अभी कोई औषधि नहीं है, सिवाय एहतियात के। चिकित्सा जगत ने फिलहाल कोरोना के सामने हाथ खड़े कर दिए हैं। देश के देश ‘लॉक डाउन’ के लिए मजबूर हैं। विषाणु से बचने का एक ही उपाय है दूरियां। समाज से ही नहीं परिवार से भी दूरियां। पास-पास रहने का आदी समाज इन दूरियों को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है। इसलिए बार-बार एकांत की व्यवस्था को भंग कर बैठती है और फिर उसे पुलिस की लाठी भी खाना पड़ती है।

वास्तविकता ये है कि 130  करोड़ की आबादी वाले भारत में यदि सोशल प्लेटफार्म इंटरनेट के जरिये हासिल न हों तो आदमी अवसाद में चला जाये। सिनेमा, किताबें, तस्वीरें, संगीत, आध्यात्म कुछ भी आदमी को इससे बचाने में समर्थ नहीं दिखाई दे रहा। आखिर आदमी अकेला रहे तो रहे कैसे? अक्सर आर्थिक  गतिविधियों में उलझे समाज के पास एक-दूसरे से बात करने का समय नहीं होता किन्तु आज उसकी समझ में आ गया है कि एकांत कितना त्रासद और भयंकर होता है।

एक लम्बे अरसे के बाद मै खुद एकांत में हूँ और परेशान हूँ, अक्सर ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि दुनिया को इस एकांत से यथाशीघ्र मुक्ति दिलाये ताकि सड़कों पर ही नहीं आसमान में पसरा सन्नाटा भी टूटे।

लोग एक-दूसरे के साथ फिर घुल-मिलकर बैठ सकें, बतिया सकें और जादू की झप्पियाँ दे सकें। संवेदना और स्नेह से एक-दूसरे की हथेलियां दबा सकें। मौत के डर ने हमसे ये सब तरीके छीन लिए हैं। हम इस समय एक आक्रान्त और असहाय समाज का हिस्सा हैं। हमें इस समस्या से शायद ये दूरियां ही बाहर निकलेंगी। इसलिए कोशिश कीजिये कि ये दूरियां बहुत जल्द नजदीकियों में बदलें। हम कोरोना के खिलाफ शुरू हुई जंग को ही न जीतें बल्कि आने वाले दिनों में दूसरे विषाणुओं से जूझने की ताकत भी हासिल कर सकें। भारत में इस विषय में अद्वितीय एकजुटता दिखाई है। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि इस घटना को भी सियासत के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। 

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